Thursday, January 24, 2019

दिल्ली में सीवर सफ़ाई के दौरान फिर एक मज़दूर की मौत, न्याय की आस में परिजन: ग्राउंड रिपोर्ट

नाला साफ़ करने के दौरान किशनलाल नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. उनकी मौत से उनकी पत्नी इंदु देवी और उनके तीन बच्चे सदमे में हैं.

किशनलाल के बड़े लड़के कहते हैं कि पापा हमें खूब पढ़ने के लिए कहते थे, वो चाहते थे कि हम भाई-बहन उनके जैसा काम न करें और एक दिन बड़ा अफ़सर बनें.

36 साल के किशनलाल के साथ ये हादसा 20 जनवरी की दोपहर एक से डेढ़ बजे के बीच हुआ.

परिवार में अकेले कमाने वाले किशनलाल पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन बच्चों को खूब पढ़ाना चाहते थे.

बड़ी सड़क के साथ सटे नाले और उसके साथ बसी तिमारपुर की इन झुग्गियों में जब हम किशनलाल के घर जाना चाह रहे थे तो कुछ बच्चे पास आकर पूछते हैं कि आप भी वहीं जाना चाहती हैं जिनकी मौत हो गई है!

फिर वो हमें उनके घर तक ले गए, लोगों ने बताया सुबह से वहां टीवी वाले आ रहे हैं.

घर के दरवाज़े पर 'शिक्षित भारत' के साथ किशनलाल के नाम की तख्ती लगी है. लगभग 6x8 के आकार की छोटी-सी इस झुग्गी में उनकी पत्नी पड़ोस की कुछ महिलाओं के साथ बैठी थीं.

उन महिलाओं ने शिकायती लहजे में कहा, "सुबह से मीडिया वाले आ रहे हैं, कोई इस ग़रीब को न्याय भी दिलाएगा या ऐसे ही आ रहे हैं!"

कुछ पूछने से पहले ही इंदु (किशनलाल की पत्नी) के साथ बैठी महिला कहती हैं, "आप बस इस ग़रीब को एक अच्छी नौकरी ही दिलवा दो, ताकि ये अपने बच्चों को पाल सके."

किशनलाल छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे. वहां काम का साधन नहीं था इसलिए कमाने-खाने के लिए दिल्ली आए थे.

किशन की पत्नी इंदु देवी बताती हैं, "घर वालों से लड़कर हमें भी यहां साथ ले आए थे. किसी काम के लिए कभी मना नहीं करते. कभी बेलदारी, कभी मिस्त्री तो कभी सीवर या नाले की सफ़ाई के लिए चले जाते."

"कई दिनों के बाद यह नया काम मिला था, जिसके बारे में पड़ोसी दिलीप ने बताया था. 16 जनवरी से ही जाने लगे थे. पैसा भी रोज़ नहीं मिल रहा था. मालिक ने हफ़्ते में एक बार देने को कहा था."

इसी नाले की सफ़ाई के दौरान उनकी मौत हुई, उस समय उनके पास सफ़ाई के दौरान इस्तेमाल किया जाने वाला कोई सेफ़्टी उपकरण भी नहीं था.

इंदु बताती हैं, "मालिक तो सफ़ाई के लिए रस्सी भी नहीं देता था. उनके पास केवल एक पंजी (कूंड़ा खींचने वाला) होता था, जिसे वो (मालिक) देता था. बांस भी कई बार खुद से ही ले जाना होता था."

हादसे के दौरान किशनलाल उस नाले की सफ़ाई कर रहे थे जो बुराड़ी नाले में गिरता है.

उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले इस इलाके में सफ़ाई का यह काम दिल्ली का सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग करवा रहा था.

इसके लिए किशन के अलावा अन्य चार लोग अज़िज़ुल (40 साल), मनोज (35 साल), उमेश (62) साल, राजू (35 साल) भी रोज़ाना की तरह काम पर निकले थे. सभी दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जिसके लिए एक दिन के लिए 300 से 400 रुपए मिलते थे.

सड़क की एक तरफ किशन की झुग्गी है, दूसरी तरफ बुराड़ी नाला और उसमें शामिल होने वाले अन्य छोटे नाले.

मनोज बीबीसी को बताते हैं, "किशन और चाचा (उमेश) साथ में नाले में गए थे. किशन दो कदम आगे ही थे. सफ़ाई के दौरान पानी का बहाव अचानक तेज़ हो गया. किशन अंदर गए तो नाले के मुहाने पर कूड़ा फंस गया, जिसकी वजह से वो वहीं फंस गये और उनका दम घुट गया."

बाहर मौजूद साथियों ने किशन को कुछ देर ढूंढा लेकिन वो नहीं मिले. फिर उन्होंने इसकी सूचना एक अन्य साथी दिलीप को दी. जिसने पहुंचकर एक बार फिर कोशिश की. लेकिन फिर भी किशन नहीं मिले, तो उन्होंने पुलिस को ख़बर की.

दिलीप बताते हैं कि हादसा एक से डेढ़ बजे के बीच हुआ. वो कहते हैं, "कुछ देर किशन की तलाश की गई लेकिन हम असमर्थ रहे. हमने पुलिस को बुलाया. पुलिस के आते ही इस काम के लिए हमें रखने वाले अनिल वहां से भाग गए."

Wednesday, January 16, 2019

क्या आप जानते हैं कि रोज़ाना दो लाख लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ जाते हैं

विकसित देशों में बहुत से लोगों को ये अंदाज़ा ही नहीं है कि दुनिया पहले के मुक़ाबले कितनी बेहतर हो चुकी है. वो इस हक़ीक़त के ठीक उलट सोचते हैं.

हालांकि, इसमें अचरज की कोई बात नहीं. आज ख़बरों में आपदा, चरमपंथी हमलों, युद्धों और अकाल की ख़बरें छाई रहती हैं. ऐसे में लोगों का ये सोचना लाज़िमी है कि आज का दौर पहले से बहुत बुरा है.

ऐसे में अगर किसी को ये बताया जाए कि आज रोज़ाना दो लाख लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ जाते हैं या फिर रोज़ दुनिया भर में क़रीब तीन लाख लोग बिजली और साफ़ पानी की सहूलत पहली बार हासिल करते हैं, तो, इन पर कौन यक़ीन करेगा?

अमीर मुल्कों में ग़रीब देशों की इन उपलब्धियों की कोई चर्चा नहीं होती. ये कामयाबियां ख़बरों का हिस्सा नहीं बनतीं. लेकिन, जैसा कि हान्स रोज़लिंग ने अपनी किताब 'फैक्टफुलनेस' में लिखा है कि हमें सभी बुरी ख़बरों को एक ख़ास नज़रिए से तौलना चाहिए.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भूमंडलीकरण ने विकसित देशों के मध्यम वर्ग की ज़िंदगी में मुश्किलें खड़ी की हैं. लेकिन, ये भी एक हक़ीक़त है कि इस ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से लाखों लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ सके हैं. इस तरक़्क़ी का एक बड़ा हिस्सा भारत जैसे दक्षिणी और पूर्वी एशियाई देशों से आया है.

आज दुनिया भर में लोक-लुभावन राजनीति का चलन बढ़ रहा है. पश्चिमी देशों, ख़ास तौर से अमरीका और पश्चिमी यूरोप में ये चलन देखने को मिल रहा है. ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का फ़ैसला किया. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश को कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों की पाबंदियों से आज़ाद करा लिया.

भारत में मौजूदा केंद्र सरकार हो या राज्यों की सरकारें, किसानों की क़र्ज़ माफ़ी और ग़रीबों को दूसरी सहूलतें मुफ़्त में देने के एलान कर रही हैं. यूरोपीय देशों इटली और हंगरी के चुनावों में भी ऐसे वादे करने वाले नेता चुनाव जीतते हैं. इन देशों के नेता, लोगों से ग्लोबलाइज़ेशन की जवाबदेही से बचाने के वादे पर सत्ता में आए हैं.

पर, जानकार कहते हैं कि हम अगर तरक़्क़ी के फ़ायदे पूरी मानवता में बराबरी से बांटना चाहते हैं, तो इसका एक ही ज़रिया है-भूमंडलीकरण. यानी सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से जुड़कर, क़दमताल मिलाकर साथ चलें. ऐसा न हो कि जर्मनी अपनी दिशा में चले और अमरीका अपनी मर्ज़ी से. फिर, इन देशों की अमीरी से मानवता का भला नहीं होगा.

यूं तो बुज़ुर्गों की आदत होती है कि पहले का ज़माना अच्छा था, जैसे जुमले कहें. पर, सच्चाई ये है कि दुनिया आज जितनी अच्छी पहले कभी न थी. मानवता का आर्थिक इतिहास कहता है कि हाल के कुछ दशकों से पहले दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बहुत ग़रीबी में जीवन बिताता आया है. इंसानियत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि आर्थिक तरक़्क़ी के फ़ायदे दुनिया के ग़रीबों तक पहुंच रहे हैं.

हम इन सात आंकड़ों से आप को बताते हैं कि क्यों दुनिया आज पहले से बेहतर है. आज से कुछ दशक पहले के मुक़ाबले भी हम बेहतरी के कितनी पायदान चढ़ चुके हैं.

1. औसत उम्र लगातार बढ़ रही है
जिस वक़्त यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई, उस वक़्त भी यूरोपीय देशों की आबादी की औसत उम्र 35 साल ही थी. इसका ये मतलब नहीं कि ज़्यादातर लोग इस उम्र के आते-आते मर जाते थे. बल्कि, उस वक़्त नवजात बच्चों की मौत इतनी ज़्यादा होती थी कि औसत उम्र बहुत कम हो जाती थी.

बच्चों को जन्म देते वक़्त महिलाओं की मौत हो जाने की घटनाएं आम हुआ करती थीं. चेचक और प्लेग जैसी बीमारियां हज़ारों लोगों को एक साथ ख़त्म कर देती थीं. आज अमीर देशों में तो इन बीमारियों का पूरी तरह से ख़ात्मा हो चुका है. इंसान की जान लेने वाली और भी कई बीमारियों को तरक़्क़ी के पहिए ने हमेशा के लिए दफ़्न कर दिया है.

2. बच्चों की मौत की दर लगातार घट रही है
एक सदी पहले की ही बात करें, तो अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी 100 में से दस बच्चों की मौत पैदा होने के फ़ौरन बाद हो जाती थी. लेकिन, मेडिकल साइंस की तरक़्क़ी और जनता के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के चलते अमीर देशों में नवजात बच्चों की मौत अब न के बराबर होती है.

इसी तरह, ब्राज़ील और भारत जैसे विकासशील देशों में आज बच्चों की मौत की दर बहुत कम रह गई है. आज भारत और ब्राज़ील में नवजात बच्चों की मृत्यु दर एक सदी पहले के अमीर देशों की दर से बहुत कम हो चुकी है.

3. आबादी बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो रही है
आज बहुत से देशों में जनसंख्या विस्फोट की बात होती है. अर्थशास्त्री कहते हैं कि आबादी बढ़ने की दर पर लगाम लगनी चाहिए. लेकिन, सच तो ये है कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में आबादी बढ़ने की दर घटी है. संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड का अनुमान है कि इस सदी के आख़िर तक दुनिया की आबादी 11 अरब के आस-पास पहुंचकर स्थिर हो जाएगी.

ब्राज़ील, चीन और कई अफ्ऱीकी देशों में जनसंख्या की विकास दर बहुत ही कम रह गई है. विकसित देशों में आबादी बढ़ने की इस दर को हासिल करने में औद्योगिक क्रांति के बाद भी 100 साल लग गए थे. मगर, कई विकासशील देशों ने आबादी बढ़ने की रफ़्तार पर एक-दो दशकों में ही क़ाबू पा लिया.

4. विकसित देशों की विकास दर बढ़ रही है
अमरीका और पश्चिमी यूरोप, जो तकनीक के मामले में बहुत आगे हैं, वो आज दो प्रतिशत सालाना की दर से तरक़्क़ी कर रहे हैं. उनकी ये विकास दर पिछले 150 सालों से बनी हुई है. इसका मतलब ये है कि इन देशों में औसत आमदनी हर 36 साल में दोगुनी हो जाती है.

इस दौरान बीसवीं सदी के तीसरे देश में ग्रेट डिप्रेशन जैसी भयंकर आर्थिक मंदी भी आई. और 2008 की मंदी का झटका भी दुनिया ने झेला. लेकिन, लंबे वक़्त की बात करें, तो तरक़्क़ी की रफ़्तार कमोबेश यही रही है.

चीन और भारत जैसे कम आमदनी वाले देश तो बहुत तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहे हैं. इस वजह से ये देश अर्थव्यवस्था के मामले में बहुत जल्द पश्चिमी देशों के स्तर पर पहुंच जाएंगे. लंबे वक़्त तक अगर किसी देश की विकास दर 10 प्रतिशत के आस-पास रहती है, तो आम लोगों की आमदनी सात सालों में दोगुनी हो जाती है. अब ये उपलब्धि अगर ग़रीब जनता के साथ साझा की जाती है, तो अच्छी ख़बर ही है.

Tuesday, January 8, 2019

सऊदी युवती ने कनाडा में मांगी शरण, पिता बैंकॉक पहुँचे

इस्लाम और अपना घर छोड़ सऊदी अरब से भागने वाली 18 वर्षीया युवती ने कहा है कि वो कनाडा, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया या ब्रिटेन में शरण लेना चाहती हैं.

रहाफ़ मोहम्मद अल-क़ुनून ने सोशल मीडिया की वजह से दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा. महज़ डेढ़ दिन में उनके ट्विटर एकाउंट पर 50,000 फ़ॉलोअर जुड़ गए.

वो बैंकॉक हवाई अड्डे से ट्विटर पर लगातार अपनी हालत बताती जा रही थीं. मंगलवार को उन्होंने फिर ये ट्वीट कियाः "मैं कनाडा/अमरीका/ऑस्ट्रेलिया/ब्रिटेन से सुरक्षा मांगती हूँ. उनके प्रतिनिधि मुझसे संपर्क करें."

ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि मानवीय आधार पर किसी भी वीज़ा के आवेदन पर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था की प्रक्रिया पूरी होने के बाद विचार किया जाएगा.

इस बीच थाई अधिकारियों ने कहा है कि रहाफ़ क़ुनून के पिता अपनी बेटी को देखने के लिए बैंकॉक पहुँच गए हैं.

रहाफ़ ने सोमवार से ही अपने आप को बैंकॉक एयरपोर्ट पर एक होटल के कमरे में ख़ुद को बंद रखा हुआ है ताकि उन्हें डिपोर्ट नहीं कर दिया जाए.

उन्होंने इस बारे में भी ट्वीट किया और लिखाः "मुझे पता चला है कि मेरे पिता पहुँच गए हैं और मैं इससे चिंतित और बहुत डरी हुई हूँ. मगर मैं यूएनएचसीआर और थाई अधिकारियों की हिफ़ाज़त में सुरक्षित महसूस कर रही हूँ."

रहाफ़ मोहम्मद अल-क़ुनून का कहना है कि वो शनिवार को जैसे ही बैंकॉक पहुँचीं, एक सऊदी राजनयिक ने उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जिससे वो फ़्लाइट से उतरते वक़्त मिली थीं.

रहाफ़ का कहना है कि उन्हें डर है कि उसके घरवाले उसे मार डालेंगे क्योंकि उन्होंने इस्लाम त्याग दिया था.

वे कुवैत से भागकर बैंकॉक आ गई थीं जहाँ से वो ऑस्ट्रेलिया जाना चाहती थीं मगर वहाँ हवाई अड्डे पर सऊदी अधिकारियों ने उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया.

इसके बाद उन्हें दोबारा कुवैत भेजने की कोशिश की गई मगर उन्होंने अपने आपको एयरपोर्ट पर ही एक होटल में बंद कर लिया और वहाँ से वो सोशल मीडिया और फ़ोन के ज़रिए मदद लेने की कोशिश करने लगीं.

उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए कहा, "मेरे भाई और परिवार और सऊदी दूतावास के लोग कुवैत में मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे. मेरी जान ख़तरे में है. मेरे घरवाले किसी भी छोटी बात पर मेरी जान लेने की धमकी देते रहते हैं."

उनके संदेशों के बाद कई मानवाधिकार संगठनों ने भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी.

रहाफ़ ने कहा कि वो तब तक अपने होटल के कमरे से नहीं निकलेंगी जब तक कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी से नहीं मिलने दिया जाता.

थाईलैंड की इमिग्रेशन पुलिस के प्रमुख सुराचाते हकपर्न ने सोमवार को कहा,"वो अब थाईलैंड के अधिकार क्षेत्र में हैं, कोई व्यक्ति या कोई भी दूतावास उन्हें कहीं और जाने के लिए दबाव नहीं डाल सकता".

मोहम्मद अल-क़ुनन के इस मामले ने साल 2017 के एक पुराने मामले की यादों को ताज़ा कर दिया है जब एक और सऊदी महिला फ़िलीपींस के रास्ते ऑस्ट्रेलिया जाना चाहती थी.

24 वर्षीय दीना अली लसलूम कुवैत से फ़िलीपींस के रास्ते ऑस्ट्रेलिया जाना चाहती थीं लेकिन मनीला एयरपोर्ट से उनका परिवार उन्हें वापस सऊदी ले गया.

उस समय अली लसलूम ने कनाडा के एक पर्यटक के फ़ोन से ट्विटर पर एक वीडियो और एक संदेश पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका परिवार उनकी हत्या कर देगा.

金正恩:朝鲜领导人“病危”说的来龙去脉

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