तीन तलाक़ बिल सोमवार को राज्य सभा में पेश नहीं हो सका. विपक्ष ने बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग संसद के उच्च सदन में भी जारी रखी.
गुरुवार को मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2018 लोक सभा में पारित हो गया था. जिसके बाद बीजेपी सरकार अब इसे राज्य सभा से पास कराकर क़ानून की शक्ल देना चाहती है.
लोक सभा में जब इस बिल पर वोटिंग हुई थी तो कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट कर दिया था.
राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि हम इस बिल का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन बिल से करोड़ों लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, इसलिए इसे पहले सेलेक्ट कमिटी के पास भेजा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "सालों से हर बिल को पहले स्टैंडिंग कमेटी और फिर सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाता है. उसके बाद बहुमत के आधार पर बिल संसद से पारित होता है. लेकिन बीजेपी सरकार अहम बिलों को सीधे-सीधे पास करा रही है. ये ग़लत है."
पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्राईन ने 15 विपक्षी दलों की ओर से बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव रखा और कहा कि एक तिहाई विपक्ष तीन तलाक़ बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजना चाहता है.
कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने बीजेपी पर बिल को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि विधायी जांच के बिना कोई क़ानून नहीं बन सकता.
वहीं केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार बिल पर चर्चा के लिए तैयार है.
उन्होंने कहा, "ये इंसानियत और मानवता का मामला है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद कल तक तीन तलाक़ हो रहे हैं. विपक्ष का कोई सुक्षाव हो तो हम सुनने को तैयार हैं, लेकिन ये बिल को लटकाएं नहीं."
हंगामा बढ़ता देख उपसभापति ने राज्य सभा की कार्यवाही दो जनवरी 2019 सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी.
लेकिन कांग्रेस तीन तलाक़ बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने पर क्यों अड़ी है?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने कहा, "मुख्य वजह ये है कि मुस्लिम समुदाय इस बिल से ख़ुश नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था. लेकिन फिर सरकार ने बिल लाकर तीन तलाक़ को अपराधिक बना दिया और तीन साल की सज़ा का प्रावधान कर दिया."
नीरजा आगे कहती हैं, "हालांकि बाद में बीजेपी सरकार ने इसमें कुछ संशोधन किए. लेकिन संशोधनों के बाद भी मुस्लिम समुदाय इस बिल से ख़ुश नहीं है, क्योंकि एक तो इसे आपराधिक कर दिया है. दूसरा बीजेपी का इस बिल को लाना, वो भी चुनाव से कुछ वक़्त पहले, ये विपक्ष को सही नहीं लग रहा है. दरअसल बीजेपी का रवैया अल्पसंख्यक विरोधी माना जा रहा है. इसलिए अल्पसंख्यक वोटर जिन पार्टियों का आधार हैं, उनको लगा रहा है कि इस वक़्त ये चीज़ नहीं होनी चाहिए, इसलिए वो विरोध कर रहे हैं."
अगर सरकार बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास नहीं भेजती है तो बिल का भविष्य क्या होगा?
इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, "किसी भी पार्टी को इस बिल के भविष्य की चिंता नहीं है. और बीजेपी दिखाना चाहती है कि हमने कोशिश की. बीजेपी ये भी चाहती है कि विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी दिखें, ताकि उनको एंटी हिंदू क़रार दे दिया जाए. दरअसल बीजेपी इस तीन तलाक़ बिल के ज़रिए अपनी आज़माई हुई ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है."
नीरजा कहती हैं कि इस बिल को आपराधिक नहीं बनाया जाना चाहिए, ये एक सिविल अपराध है.
"और जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था तो इस बिल की क्या ज़रूरत है. मुझे लगता है कि ज़रूरत पड़ने पर दोनों पार्टियां अपने स्टैंड को चुनाव में भी भुनाएंगी."
क्या होती है सेलेक्ट कमेटी?
संसद के अंदर अलग-अलग मंत्रालयों की स्थायी समिति होती है, जिसे स्टैंडिंग कमेटी कहते हैं. इससे अलग जब कुछ मुद्दों पर अलग से कमेटी बनाने की ज़रूरत होती है तो उसे सेलेक्ट कमेटी कहते हैं.
इसका गठन स्पीकर या सदन के चेयरपर्सन करते हैं. इस कमेटी में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है. काम पूरा होने के बाद इस कमेटी को भंग कर दिया जाता है.
Monday, December 31, 2018
Thursday, December 27, 2018
अटल बिहारी वाजपेयी के 10 फ़ैसले जिनके आईने में इतिहास उन्हें तौलेगा
अटल बिहारी वाजपेयी जीवित होते तो 94 साल के हो गए होते. हालांकि वे अब नहीं हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी भारतीय राजनीति में हमेशा रहेगी.
16 अगस्त, 2018 को वाजपेयी का निधन हो गया था. उनके गुजरने के कुछ महीने बाद अब उनके जन्मदिन को भारतीय जनता पार्टी व्यापक तौर पर मना रही है.
केंद्र सरकार ने इस मौके पर वाजपेयी की तस्वीर वाला 100 रुपये का सिक्का भी जारी किया है.
बतौर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी हर मुमकिन ऊंचाई तक पहुंचे, वे प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे.
कभी महज़ दो सीटों वाली पार्टी रही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनाने की उपलब्धि केवल अटल बिहारी वाजपेयी की भारतीय राजनीति में सहज स्वीकार्यता के बूते की बात थी, जिसे भांपते हुए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी लालकृष्ण आडवाणी को पीछे रखकर वाजपेयी को आगे बढ़ाना पड़ा था.
वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे, पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया. इस दौरान उन्होंने ये साबित किया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलता से चलाया जा सकता है.
ज़ाहिर है कि जब वाजपेयी स्थिर सरकार के मुखिया बने तो उन्होंने ऐसे कई बड़े फ़ैसले लिए जिसने भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया, ये वाजपेयी की कुशलता ही कही जाएगी कि उन्होंने एक तरह से दक्षिणपंथ की राजनीति को भारतीय जनमानस में इस तरह रचा बसा दिया जिसके चलते एक दशक बाद भारतीय जनता पार्टी ने वो बहुमत हासिल कर दिखाया जिसकी एक समय में कल्पना भी नहीं की जाती थी.
एक नज़र बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उन फ़ैसलों की जिसका असर लंबे समय तक भारतीय राजनीति में नज़र आता रहेगा.
प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी के जिस काम को सबसे ज़्यादा अहम माना जा सकता है वो सड़कों के माध्यम से भारत को जोड़ने की योजना है.
उन्होंने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना लागू की. साथ ही ग्रामीण अंचलों के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना लागू की. उनके इस फ़ैसले ने देश के आर्थिक विकास को रफ़्तार दी.
हालांकि, उनकी सरकार के दौरान ही भारतीय स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना का ख़ाका भी बना था. उन्होंने 2003 में सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया था. हालांकि, जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने काफ़ी विरोध किया था.
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान देश में निजीकरण को उस रफ़्तार तक बढ़ाया गया जहां से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बची. वाजपेयी की इस रणनीति के पीछे कॉर्पोरेट समूहों की बीजेपी से सांठगांठ रही होगी हालांकि उस दौर में इसे उनके नज़दीकी रहे प्रमोद महाजन की सोच का असर भी माना गया था.
वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक अनोखा मंत्रालय का गठन किया था. इसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे. शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी जी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान ज़िंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी.
इतना ही नहीं वाजपेयी से पहले देश में बीमा का क्षेत्र सरकारी कंपनियों के हवाले ही था, लेकिन वाजपेयी सरकार ने इसमें विदेशी निवेश के रास्ते खोले. उन्होंने बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 26 फ़ीसदी तक किया था, जिसे 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49 फ़ीसदी तक कर दिया.
इन कंपनियों के निजीकरण से नियुक्तियों में आरक्षण की बध्यता भी ख़त्म हो गई. बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी के निजीकरण को बढ़ाने वाले इस क़दम की आज भी ख़ूब आलोचना होती है.
16 अगस्त, 2018 को वाजपेयी का निधन हो गया था. उनके गुजरने के कुछ महीने बाद अब उनके जन्मदिन को भारतीय जनता पार्टी व्यापक तौर पर मना रही है.
केंद्र सरकार ने इस मौके पर वाजपेयी की तस्वीर वाला 100 रुपये का सिक्का भी जारी किया है.
बतौर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी हर मुमकिन ऊंचाई तक पहुंचे, वे प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे.
कभी महज़ दो सीटों वाली पार्टी रही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनाने की उपलब्धि केवल अटल बिहारी वाजपेयी की भारतीय राजनीति में सहज स्वीकार्यता के बूते की बात थी, जिसे भांपते हुए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी लालकृष्ण आडवाणी को पीछे रखकर वाजपेयी को आगे बढ़ाना पड़ा था.
वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे, पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया. इस दौरान उन्होंने ये साबित किया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलता से चलाया जा सकता है.
ज़ाहिर है कि जब वाजपेयी स्थिर सरकार के मुखिया बने तो उन्होंने ऐसे कई बड़े फ़ैसले लिए जिसने भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया, ये वाजपेयी की कुशलता ही कही जाएगी कि उन्होंने एक तरह से दक्षिणपंथ की राजनीति को भारतीय जनमानस में इस तरह रचा बसा दिया जिसके चलते एक दशक बाद भारतीय जनता पार्टी ने वो बहुमत हासिल कर दिखाया जिसकी एक समय में कल्पना भी नहीं की जाती थी.
एक नज़र बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उन फ़ैसलों की जिसका असर लंबे समय तक भारतीय राजनीति में नज़र आता रहेगा.
प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी के जिस काम को सबसे ज़्यादा अहम माना जा सकता है वो सड़कों के माध्यम से भारत को जोड़ने की योजना है.
उन्होंने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना लागू की. साथ ही ग्रामीण अंचलों के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना लागू की. उनके इस फ़ैसले ने देश के आर्थिक विकास को रफ़्तार दी.
हालांकि, उनकी सरकार के दौरान ही भारतीय स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना का ख़ाका भी बना था. उन्होंने 2003 में सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया था. हालांकि, जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने काफ़ी विरोध किया था.
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान देश में निजीकरण को उस रफ़्तार तक बढ़ाया गया जहां से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बची. वाजपेयी की इस रणनीति के पीछे कॉर्पोरेट समूहों की बीजेपी से सांठगांठ रही होगी हालांकि उस दौर में इसे उनके नज़दीकी रहे प्रमोद महाजन की सोच का असर भी माना गया था.
वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक अनोखा मंत्रालय का गठन किया था. इसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे. शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी जी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान ज़िंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी.
इतना ही नहीं वाजपेयी से पहले देश में बीमा का क्षेत्र सरकारी कंपनियों के हवाले ही था, लेकिन वाजपेयी सरकार ने इसमें विदेशी निवेश के रास्ते खोले. उन्होंने बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 26 फ़ीसदी तक किया था, जिसे 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49 फ़ीसदी तक कर दिया.
इन कंपनियों के निजीकरण से नियुक्तियों में आरक्षण की बध्यता भी ख़त्म हो गई. बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी के निजीकरण को बढ़ाने वाले इस क़दम की आज भी ख़ूब आलोचना होती है.
Monday, December 17, 2018
कमलनाथ के बहाने भोपाल में लगे संजय गांधी के पोस्टर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पोस्टर-बैनरों पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र और राहुल गांधी के चाचा संजय गांधी की तस्वीरें आम नहीं हैं.
ख़ास तौर से संजय की पत्नी मेनका और पुत्र वरुण गांधी के पारिवारिक खटपट के बाद भाजपा में चले जाने के बाद से संजय गांधी का चेहरा पार्टी के आधिकारिक बैनरों से लापता हो गया है.
मध्य प्रदेश में सोमवार को कमलनाथ ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर किसानों की कर्ज़माफ़ी का वादा पूरा करने का ऐलान कर दिया है. लेकिन भोपाल की सड़कों पर चर्चा एक बैनर की भी हो रही है, जिसमें नए मुख्यमंत्री कमलनाथ का अभिनंदन करते हुए साथ में संजय गांधी की तस्वीर लगाई गई है. यह तस्वीर सोमवार को अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने छापी है.
संजय गांधी की यह तस्वीर अकारण नहीं है, क्योंकि कमलनाथ की कहानी संजय गांधी से उनकी क़रीबी के क़िस्से के बग़ैर अधूरी है.
गांधी परिवार से क़रीबी
कई पत्रकार पुष्टि करते हैं कि इंदिरा गांधी के दौर में कुछ समय के लिए यह नारा भी लगा करता था कि 'इंदिरा गांधी के दो हाथ, संजय गांधी और कमल नाथ.'
कमलनाथ को 1980 में छिंदवाड़ा से गार्गी शंकर मिश्रा की जगह टिकट दिया गया था. जबकि गार्गी उन नेताओं में थे जो कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल 1977 के चुनाव में भी जीतकर आए थे. 1977 में जनता पार्टी की ऐसी लहर थी कि इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि कमलनाथ के पहले चुनाव के लिए इंदिरा गांधी प्रचार करने छिंदवाड़ा गई थीं और उन्होंने एक सभा में कहा था कि लोग उनके तीसरे बेटे कमलनाथ को चुनाव जिताएं.
1980 के दशक में कांग्रेस की ओर से कई युवा सांसद जीतकर आए थे, जिनमें कमलनाथ भी थे. विपक्ष ने उन्हें सामूहिक तौर पर उन्हें 'संजय के छोकरे' में एक माना था.
कांग्रेस पर नज़र रखने वाले पत्रकार पंकज वोहरा बताते हैं कि कमलनाथ, संजय गांधी और अकबर अहमद डंपी तीनों दून स्कूल में साथ में पढ़ते थे और उनकी गहरी मित्रता थी. इंदिरा गांधी के समय कमलनाथ कांग्रेस में शामिल हुए.
वोहरा के मुताबिक, "1977 में जब संजय गांधी पहली बार अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो अकबर अहमद डंपी और कमलनाथ दोनों उनके साथ ही रहते थे. कमलनाथ चुनाव प्रबंधन में मदद करते थे. वह लखनऊ के एक होटल में ठहरे हुए थे और वहां से हर रोज़ अमेठी आते-जाते थे. वह चुनाव प्रचार के समय संजय गांधी के साथ ही रहते थे."
संजय से मित्रता से पहले कमलनाथ की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि कमलनाथ राजनीतिक तिकड़मों में माहिर थे और मुश्किल काम करवाना जानते थे. इसीलिए कांग्रेस में उन्हें औपचारिक पद भले ही जल्दी न मिला हो लेकिन वह संजय गांधी की मंडली में शामिल हो गए थे.
कमलनाथ में ख़ास क्या था
संजय के व्यवहार-कौशल का उदाहरण देते हुए किदवई एक क़िस्सा सुनाते हैं.
किदवई बताते हैं, "जब 1978 में जनता पार्टी का शासन चल रहा था तब कमलनाथ को ख़बर मिली कि चौधरी चरण सिंह, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से ख़ुश नहीं हैं. उन्होंने राजनारायण से संपर्क साधा और उनसे कहा कि अगर चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो जाते हैं तो कांग्रेस समर्थन देकर उन्हें प्रधानमंत्री बना देगी. बाद में यही हुआ. हालांकि वह सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाई."
"कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और दोबारा इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. उस दौर में राजनीतिक तिकड़मों में कमलनाथ का अहम योगदान था. इंदिरा गांधी राजनारायण से मिलकर ये काम नहीं कर सकती थीं. कमलनाथ ने अपने सूत्रों के आधार पर ये काम किया था."
वह बताते हैं कि 1977 के बाद जो नई कांग्रेस बनी थी, जिसे कांग्रेस आई कहा गया, उसे बनाने में भी कमलनाथ का अहम योगदान था.
वहीं पंकज वोहरा मानते हैं कि कमलनाथ की असल ताक़त ये है कि वे सुनियोजित तरीक़े से काम करने वाले नेता हैं. उनके मुताबिक, "जितने योजनाबद्ध तरीक़े से कमलनाथ काम करते हैं, जिस तरह वह बारीक़ ब्यौरों में जाते है, वह आज कल दुर्लभ है. उनकी ये बात इंदिरा और संजय को पसंद आई."
ख़ास तौर से संजय की पत्नी मेनका और पुत्र वरुण गांधी के पारिवारिक खटपट के बाद भाजपा में चले जाने के बाद से संजय गांधी का चेहरा पार्टी के आधिकारिक बैनरों से लापता हो गया है.
मध्य प्रदेश में सोमवार को कमलनाथ ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर किसानों की कर्ज़माफ़ी का वादा पूरा करने का ऐलान कर दिया है. लेकिन भोपाल की सड़कों पर चर्चा एक बैनर की भी हो रही है, जिसमें नए मुख्यमंत्री कमलनाथ का अभिनंदन करते हुए साथ में संजय गांधी की तस्वीर लगाई गई है. यह तस्वीर सोमवार को अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने छापी है.
संजय गांधी की यह तस्वीर अकारण नहीं है, क्योंकि कमलनाथ की कहानी संजय गांधी से उनकी क़रीबी के क़िस्से के बग़ैर अधूरी है.
गांधी परिवार से क़रीबी
कई पत्रकार पुष्टि करते हैं कि इंदिरा गांधी के दौर में कुछ समय के लिए यह नारा भी लगा करता था कि 'इंदिरा गांधी के दो हाथ, संजय गांधी और कमल नाथ.'
कमलनाथ को 1980 में छिंदवाड़ा से गार्गी शंकर मिश्रा की जगह टिकट दिया गया था. जबकि गार्गी उन नेताओं में थे जो कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल 1977 के चुनाव में भी जीतकर आए थे. 1977 में जनता पार्टी की ऐसी लहर थी कि इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि कमलनाथ के पहले चुनाव के लिए इंदिरा गांधी प्रचार करने छिंदवाड़ा गई थीं और उन्होंने एक सभा में कहा था कि लोग उनके तीसरे बेटे कमलनाथ को चुनाव जिताएं.
1980 के दशक में कांग्रेस की ओर से कई युवा सांसद जीतकर आए थे, जिनमें कमलनाथ भी थे. विपक्ष ने उन्हें सामूहिक तौर पर उन्हें 'संजय के छोकरे' में एक माना था.
कांग्रेस पर नज़र रखने वाले पत्रकार पंकज वोहरा बताते हैं कि कमलनाथ, संजय गांधी और अकबर अहमद डंपी तीनों दून स्कूल में साथ में पढ़ते थे और उनकी गहरी मित्रता थी. इंदिरा गांधी के समय कमलनाथ कांग्रेस में शामिल हुए.
वोहरा के मुताबिक, "1977 में जब संजय गांधी पहली बार अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो अकबर अहमद डंपी और कमलनाथ दोनों उनके साथ ही रहते थे. कमलनाथ चुनाव प्रबंधन में मदद करते थे. वह लखनऊ के एक होटल में ठहरे हुए थे और वहां से हर रोज़ अमेठी आते-जाते थे. वह चुनाव प्रचार के समय संजय गांधी के साथ ही रहते थे."
संजय से मित्रता से पहले कमलनाथ की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि कमलनाथ राजनीतिक तिकड़मों में माहिर थे और मुश्किल काम करवाना जानते थे. इसीलिए कांग्रेस में उन्हें औपचारिक पद भले ही जल्दी न मिला हो लेकिन वह संजय गांधी की मंडली में शामिल हो गए थे.
कमलनाथ में ख़ास क्या था
संजय के व्यवहार-कौशल का उदाहरण देते हुए किदवई एक क़िस्सा सुनाते हैं.
किदवई बताते हैं, "जब 1978 में जनता पार्टी का शासन चल रहा था तब कमलनाथ को ख़बर मिली कि चौधरी चरण सिंह, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से ख़ुश नहीं हैं. उन्होंने राजनारायण से संपर्क साधा और उनसे कहा कि अगर चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो जाते हैं तो कांग्रेस समर्थन देकर उन्हें प्रधानमंत्री बना देगी. बाद में यही हुआ. हालांकि वह सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाई."
"कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और दोबारा इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. उस दौर में राजनीतिक तिकड़मों में कमलनाथ का अहम योगदान था. इंदिरा गांधी राजनारायण से मिलकर ये काम नहीं कर सकती थीं. कमलनाथ ने अपने सूत्रों के आधार पर ये काम किया था."
वह बताते हैं कि 1977 के बाद जो नई कांग्रेस बनी थी, जिसे कांग्रेस आई कहा गया, उसे बनाने में भी कमलनाथ का अहम योगदान था.
वहीं पंकज वोहरा मानते हैं कि कमलनाथ की असल ताक़त ये है कि वे सुनियोजित तरीक़े से काम करने वाले नेता हैं. उनके मुताबिक, "जितने योजनाबद्ध तरीक़े से कमलनाथ काम करते हैं, जिस तरह वह बारीक़ ब्यौरों में जाते है, वह आज कल दुर्लभ है. उनकी ये बात इंदिरा और संजय को पसंद आई."
Thursday, December 13, 2018
राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी अनुत्तरित रह गए ये सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट से 36 राफेल विमान सौदे में किसी तरह की जांच की संभावना को नकारते हुए कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच से मना कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 8.7 बिलियन डॉलर की रक्षा डील में किसी तरह की अनियमितता नहीं पाई है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने फैसला सुनाते हुए कहा कि उन्हें ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे कहा जा सके कि सरकार ने किसी निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए फ्रांस के साथ समझौता किया.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से केन्द्र सरकार को राहत मिली है और विपक्ष की सीबीआई जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया गया है. इस फैसले के बावजूद भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए इस सौदे पर कई अनुत्तरित सवाल हैं जिनका जवाब न तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला और न ही इन सवालों का कोई जवाब सरकार से मिलने की उम्मीद है.
राफेल का वंशवाद: तजुर्बा नहीं, परिवार देखकर दसॉल्ट ने किया अंबानी से करार
पार्टनर चुनने पर सवाल?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उसे राफेल डील में ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि केन्द्र सरकार ने दसॉल्ट समझौते में रिलायंस को फायदा पहुंचाने का काम किया. कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि दसॉल्ट से करार में ऑफसेट पार्टनर चुनने का दारोमदार फ्रांस की कंपनी के पास था. लेकिन सवाल यह है कि जब भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुई इस डील में दसॉल्ट के लिए यह जिम्मेदारी छोड़ी गई तब किस आधार पर भारत सरकार की एविएशन इकाई एचएएल एक ऐसी कंपनी से पिछड़ गई जिसने एविएशन क्षेत्र में कदम करार के बाद रखा.
राफेल पर कौन कर रहा है गुमराह? राहुल, मैक्रों, निर्मला में गलत कौन?
ऑफसेट क्लॉज फ्रांस-भारत डील का हिस्सा?
इस डील के साथ ही भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच समझौता किया गया था कि डील से दसॉल्ट को हुई कुल कमाई का आधा हिस्सा कंपनी को एक निश्चित तरीके से वापस भारत में निवेश करना होगा. डील के इस पक्ष को ऑफसेट क्लॉज कहा गया. लिहाजा, डील के तहत दसॉल्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वह 8.7 बिलियन डॉलर की आधी रकम को वापस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करे. लिहाजा, निवेश जब इस पैसे से होना था और ऑफसेट क्लॉज भारत-फ्रांस सरकार की डील का हिस्सा है तक यह निवेश भारत में 3 दशक से एविएशन में काम करने वाली कंपनी की जगह ऐसी कंपनी में हुआ जिसकी नींव करार के बाद रखी गई.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से केन्द्र सरकार को राहत मिली है और विपक्ष की सीबीआई जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया गया है. इस फैसले के बावजूद भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए इस सौदे पर कई अनुत्तरित सवाल हैं जिनका जवाब न तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला और न ही इन सवालों का कोई जवाब सरकार से मिलने की उम्मीद है.
राफेल का वंशवाद: तजुर्बा नहीं, परिवार देखकर दसॉल्ट ने किया अंबानी से करार
पार्टनर चुनने पर सवाल?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उसे राफेल डील में ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि केन्द्र सरकार ने दसॉल्ट समझौते में रिलायंस को फायदा पहुंचाने का काम किया. कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि दसॉल्ट से करार में ऑफसेट पार्टनर चुनने का दारोमदार फ्रांस की कंपनी के पास था. लेकिन सवाल यह है कि जब भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुई इस डील में दसॉल्ट के लिए यह जिम्मेदारी छोड़ी गई तब किस आधार पर भारत सरकार की एविएशन इकाई एचएएल एक ऐसी कंपनी से पिछड़ गई जिसने एविएशन क्षेत्र में कदम करार के बाद रखा.
राफेल पर कौन कर रहा है गुमराह? राहुल, मैक्रों, निर्मला में गलत कौन?
ऑफसेट क्लॉज फ्रांस-भारत डील का हिस्सा?
इस डील के साथ ही भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच समझौता किया गया था कि डील से दसॉल्ट को हुई कुल कमाई का आधा हिस्सा कंपनी को एक निश्चित तरीके से वापस भारत में निवेश करना होगा. डील के इस पक्ष को ऑफसेट क्लॉज कहा गया. लिहाजा, डील के तहत दसॉल्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वह 8.7 बिलियन डॉलर की आधी रकम को वापस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करे. लिहाजा, निवेश जब इस पैसे से होना था और ऑफसेट क्लॉज भारत-फ्रांस सरकार की डील का हिस्सा है तक यह निवेश भारत में 3 दशक से एविएशन में काम करने वाली कंपनी की जगह ऐसी कंपनी में हुआ जिसकी नींव करार के बाद रखी गई.
Monday, December 10, 2018
उर्जित पटेल के इस्तीफ़े की टाइमिंग क्यों ख़ास है
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. मोदी सरकार के साथ कई मसलों पर लंबी तनातनी के बाद उनके इस्तीफ़े की अटकलें लगाई जा रही थी.
उर्जित पटेल का कार्यकाल सितंबर 2019 तक था. यानी उन्होंने अपने निर्धारित कार्यकाल से नौ महीने पहले पद से हटने का फ़ैसला किया.
लगभग चार साल तक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रहने के बाद उर्जित ने 4 सितंबर 2016 को गवर्नर का पद संभाला था.
पटेल ने अपने इस्तीफ़े की वजह निजी बताई है, लेकिन कहा जा रहा है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता, कैश फ्लो और ब्याज दरों में कमी नहीं करने को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव था.
पटेल की इस्तीफ़े की टाइमिंग भी अहम है. पटेल का इस्तीफ़ा ऐसे समय पर आया है, जब मंगलवार को पाँच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम की विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं. संसद का शीतकालीन सत्र भी मंगलवार से ही शुरू हो रहा है, और चार दिन बाद यानी 14 दिसंबर को रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक निर्धारित है.
सोमवार को ही विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए बैठक भी की. रफ़ाल रक्षा सौदा, बेरोज़गारी, किसान समेत कई मसलों को लेकर पहले से ही केंद्र सरकार पर हमलावर विपक्ष अब आरबीआई के मुद्दे पर भी मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेगा.
रिज़र्व बैंक और मोदी सरकार के बीच तनातनी पहली बार तब उभर कर सामने आई थी जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता की वक़ालत की थी. विरल आचार्य ने मुंबई में देश के बड़े उद्योगपतियों के एक इवेंट में कहा था, 'केंद्रीय बैंक की आज़ादी को कमज़ोर करना त्रासदी जैसा हो सकता है. जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.'
हालाँकि इसके बाद 19 नवंबर को रिज़र्व बैंक बोर्ड की बैठक में आरबीआई के पास सरप्लस राशि के आवंटन के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था.
ऐसा लग रहा था कि आरबीआई गवर्नर और सरकार के बीच अब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, लेकिन उर्जित के इस्तीफ़े से लगता है कि ये द्वंद्व अभी खत्म नहीं हुआ था.
कुछ दिन पहले ही उर्जित पटेल ने बैंकों में धोखाधड़ी पर गहरा दुख जताते हुए कहा था कि केंद्रीय बैंक नीलकंठ की तरह विषपान करेगा और अपने ऊपर फेंके जा रहे पत्थरों का सामना करेगा, लेकिन हर बार पहले से बेहतर होने की उम्मीद के साथ आगे बढ़ेगा.
इसी महीने की शुरुआत में जब आरबीआई ने ब्याज़ दरों की समीक्षा की थी और इनमें किसी तरह का बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया था, तब मोदी सरकार के साथ चल रहे गतिरोध से संबंधित सवाल पूछे जाने पर उर्जित पटेल ने इस पर कोई भी जवाब देने से मना कर दिया था.
उर्जित पटेल का कार्यकाल सितंबर 2019 तक था. यानी उन्होंने अपने निर्धारित कार्यकाल से नौ महीने पहले पद से हटने का फ़ैसला किया.
लगभग चार साल तक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रहने के बाद उर्जित ने 4 सितंबर 2016 को गवर्नर का पद संभाला था.
पटेल ने अपने इस्तीफ़े की वजह निजी बताई है, लेकिन कहा जा रहा है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता, कैश फ्लो और ब्याज दरों में कमी नहीं करने को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव था.
पटेल की इस्तीफ़े की टाइमिंग भी अहम है. पटेल का इस्तीफ़ा ऐसे समय पर आया है, जब मंगलवार को पाँच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम की विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं. संसद का शीतकालीन सत्र भी मंगलवार से ही शुरू हो रहा है, और चार दिन बाद यानी 14 दिसंबर को रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक निर्धारित है.
सोमवार को ही विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए बैठक भी की. रफ़ाल रक्षा सौदा, बेरोज़गारी, किसान समेत कई मसलों को लेकर पहले से ही केंद्र सरकार पर हमलावर विपक्ष अब आरबीआई के मुद्दे पर भी मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेगा.
रिज़र्व बैंक और मोदी सरकार के बीच तनातनी पहली बार तब उभर कर सामने आई थी जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता की वक़ालत की थी. विरल आचार्य ने मुंबई में देश के बड़े उद्योगपतियों के एक इवेंट में कहा था, 'केंद्रीय बैंक की आज़ादी को कमज़ोर करना त्रासदी जैसा हो सकता है. जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.'
हालाँकि इसके बाद 19 नवंबर को रिज़र्व बैंक बोर्ड की बैठक में आरबीआई के पास सरप्लस राशि के आवंटन के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था.
ऐसा लग रहा था कि आरबीआई गवर्नर और सरकार के बीच अब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, लेकिन उर्जित के इस्तीफ़े से लगता है कि ये द्वंद्व अभी खत्म नहीं हुआ था.
कुछ दिन पहले ही उर्जित पटेल ने बैंकों में धोखाधड़ी पर गहरा दुख जताते हुए कहा था कि केंद्रीय बैंक नीलकंठ की तरह विषपान करेगा और अपने ऊपर फेंके जा रहे पत्थरों का सामना करेगा, लेकिन हर बार पहले से बेहतर होने की उम्मीद के साथ आगे बढ़ेगा.
इसी महीने की शुरुआत में जब आरबीआई ने ब्याज़ दरों की समीक्षा की थी और इनमें किसी तरह का बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया था, तब मोदी सरकार के साथ चल रहे गतिरोध से संबंधित सवाल पूछे जाने पर उर्जित पटेल ने इस पर कोई भी जवाब देने से मना कर दिया था.
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