Sunday, March 31, 2019

पश्चिम यूपी के वे इलाके जहां हिंदू-मुस्लिम का एक-दूसरे के बिन गुज़ारा नहीं

मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले को एक सड़क चीरती हुई निकलती है और इसे दो भागों में बाट देती है. इसके एक तरफ़ हाजी बाबुद्दीन जैसे मुस्लिम आबाद हैं और दूसरी तरफ विपिन कुमार रस्तोगी जैसे हिन्दुओं की दुकानें हैं.

बाबुद्दीन और रस्तोगी एक दूसरे को 30 साल से जानते हैं लेकिन इनकी दुनिया बिलकुल अलग है.

बाबुद्दीन भारतीय जनता पार्टी के कट्टर विरोधी हैं और रस्तोगी इस पार्टी के कड़े समर्थक. हमेशा की तरह इस बार भी तय है कि 11 अप्रैल को आम चुनाव के पहले चरण में बाबुद्दीन महागठबंधन के प्रत्याशी और पूर्व राज्य मंत्री हाजी याक़ूब क़ुरैशी को अपना वोट देंगे और रस्तोगी दो बार सांसद रह चुके बीजेपी के उमीदवार राजेंद्र अग्रवाल को.

इनके बीच कुछ समान नहीं है. लेकिन, पिछले 30 सालों से एक सच ने इन्हें एक-दूसरे से कस कर बाँध रखा है और वो है कारोबार में एक-दूसरे पर निर्भरता. वहां रहने वाले लोगों के अनुसार ये कारोबार सालाना 300 करोड़ रुपये का है.

बाबुद्दीन 120 पॉवरलूम मशीनों के मालिक हैं और मेरठ के दो सबसे अमीर बुनकरों में से एक हैं. दो मंज़िला घर के ऊपर वो अपने परिवार के साथ रहते हैं जहाँ अभी उन्होंने एक आधुनिक रसोई घर बनवाई है, जिसे वो गर्व के साथ लोगों को दिखाते हैं. हिंदू मुसलमान विवादों के आविष्कार का सियासी फ़ॉर्मूला

मकान के नीचे कपड़ा बनाने वाली मशीनें लगी हैं जिनसे हर वक़्त तेज़ आवाज़ें निकलती रहती हैं.

उनके कारख़ाने में कपड़े बनते हैं जिसे रस्तोगी थोक में ख़रीदते हैं. वो बाबुद्दीन के अकेले ग्राहक नहीं हैं लेकिन उनके सभी हिन्दू थोक ग्राहकों में सबसे ज़्यादा माल ख़रीदने वाले ज़रूर हैं.

बाबुद्दीन कहते हैं, "हिन्दू थोक दुकानदारों के बग़ैर मेरा काम नहीं चलता और हम बुनकरों के बग़ैर उनका नहीं. हम एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं."

रस्तोगी के मुताबिक़, "धंधे में विचारधारा, धर्म और जाती काम नहीं आतीं. बाबुद्दीन को मैं 30 सालों से जानता हूँ. वो एक परिवार की तरह हैं. हमारे विचार अलग हैं. हम वोट अलग-अलग पार्टियों को देते हैं. मज़ाक़ में एक-दूसरे की खिंचाई ज़रूर करते हैं मगर हम धंधे में भावना को जगह नहीं देते."

आर्थिक मजबूरी उन्हें एक-दूसरे से बांध कर रखती है. थोड़े समय के लिए रस्तोगी ने एक अलग व्यापार शुरू किया था जो नहीं चला. जब वो वापस लौटे तो उनका अनुभव बहुत अच्छा था.

वो भावुक होकर कहते हैं, "मुस्लिम बुनकरों ने मेरा ऐसा स्वागत किया कि मुझे लगा कि मैं अपने परिवार में वापस आ गया हूँ."

कपड़ों के अलावा कई दूसरे व्यवसायों में भी हिन्दू-मुस्लिम समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता दिखाई देती है जो सराहनीय है क्यूंकि सांप्रदायिक दंगों के इतिहास वाला मेरठ शहर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नाज़ुक रिश्ते के लिए जाना जाता है.

अफवाहों के कारण भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता है. लेकिन बाबुद्दीन और रस्तोगी जैसे लोगों के बीच घनिष्ट संबंधों के कारण अक्सर मामला बेकाबू नहीं होता.

मेरठ के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में भी हिन्दू-मुस्लिम आर्थिक निर्भरता की मिसालें मिलती हैं. शामली के सलीम त्यागी कहते हैं कि उनके शहर में गन्ने की काश्त हो या मुरादाबाद में पीतल का काम दोनों समुदायों का एक-दूसरे के बग़ैर गुज़ारा नहीं हो सकता.

कैराना में बीजेपी कार्यकर्ता शिव कुमार चौहान गुर्जर समाज से हैं. जब हमने उनसे बात की तो उनके साथ बीजेपी के कुछ और कार्यकर्ता भी बैठे थे.

हुक़्क़े पे चली चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि यहाँ चुनाव में बीजेपी और गठबंधन दोनों ने गुर्जर उम्मीदवार खड़े किये हैं. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के महागठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन आरएलडी की हैं. उन्होंने जब 2018 में उपचुनाव जीता था तो उन्हें हिन्दू और मुस्लिम गुर्जरों दोनों ने वोट दिया था.

जाट और गुर्जर, हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय में

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत है. राष्ट्रीय औसत केवल 14 प्रतिशत के मुक़ाबले में ये कहीं ज़्यादा है. इनमें 70 प्रतिशत किसान हैं.

यहाँ के अधिकतर मुसलमान ग़रीब हैं. उनके पूर्वज हिन्दू थे. इसलिए जाट और गुर्जर हिन्दू समाज में भी हैं और मुस्लिम समुदाय में भी. अधिकतर मुस्लिम धनी हिन्दू जाटों के खेतों पर काम करते हैं.

पिछले आम चुनाव से पहले मुज़फ़्फ़रनगर और शामली जैसे शहरों और देहातों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसमें हिन्दू जाटों और मुस्लिम समाज के बीच दशकों से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भावना प्रभावित हुई थी.

इसका नतीजा ये हुआ कि समाज सांप्रदायिक मुद्दों पर बंट गया. मतों के ध्रुवीकरण के नतीजे में हिन्दुओं ने बीजेपी को वोट दिया और मुसलमानों ने बीजेपी के ख़िलाफ़.

बीजेपी ने यहाँ की तमाम 8 सीटें आसानी से जीत लीं. पहले चरण के रुझान को देखते हुए बाक़ी के चरणों में उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में भी मत बीजेपी के हक़ में पड़ा. पार्टी ने राज्य की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतीं.

भारतीय किसान यूनियन के धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगों के बाद जो दूरियां बढ़ी थीं वो बीजेपी और समाजवादी पार्टी सरकारों का एक प्रोपेगंडा था. इसे दंगे का रूप दिया गया, वो बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति थी कि जाट राजनीति को मुस्लिम से अलग किया जाए. इस दंगे को वो मुस्लिम बनाम जाट बनाने में कामयाब रहे."

लेकिन इस इलाक़े के हिन्दू और मुस्लिम कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. हालात बदल चुके हैं. हिन्दू-मुस्लिमों के बीच फिर से सद्धभावना का माहौल का बन चुका है.

मुज़फ़्फ़रनगर में सामाजिक कार्यकर्ता असद फ़ारूक़ी कहते हैं, "मुसलमानों और जाटों को अब एहसास हो गया है कि एक का काम दूसरे के बग़ैर नहीं चल सकता. मुस्लिम कामगार जाटों के खेतों में काम करते थे. आज जाटों को मुस्लिम कामगारों की ज़रूरत है और मुसलमानों को जाटों के खेतों में काम करने की ज़रूरत है. आर्थिक दृष्टि से वो एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते."

Tuesday, March 19, 2019

राहुल गांधी की गुजरात रैली में 'मोदी-मोदी' के नारे लगने का सच

सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो के ज़रिए ये दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की हालिया गुजरात रैली में 'मोदी-मोदी' के नारे लगाए गए थे.

वायरल वीडियो में ओबीसी नेता और गुजरात से कांग्रेस पार्टी के विधायक अल्पेश ठाकोर मंच का संचालन करते दिखते हैं.

वीडियो में दिखता है कि ठाकोर मंच से जनता को 'राहुल गांधी ज़िंदाबाद' के नारे लगाने को बोल रहे हैं, लेकिन जवाब में 'मोदी-मोदी' के नारे सुनाई देते हैं.

41 सेकेंड के इस वीडियो को देखकर ऐसा लगता है कि अल्पेश ठाकोर लोगों के इस जवाब से नाराज़ हो जाते हैं और लोगों से चुप होने को कहते हैं.

'अगले 20 साल तक मोदी' जैसे दक्षिणपंथी रुझान वाले कई बड़े फ़ेसबुक पेज हैं जिन्होंने बीते तीन दिनों में इस वीडियो को शेयर किया है और लाखों बार इस वीडियो को देखा जा चुका है.

दो साल पुराने वीडियो से छेड़छाड़
बीबीसी ने पड़ताल में पाया कि ये वीडियो राहुल गांधी की हालिया गुजरात रैली का नहीं, बल्कि दो साल पुराना है.

ये वीडियो गुजरात के गांधीनगर में 23 अक्तूबर 2017 को हुए कांग्रेस पार्टी के 'नवसृजन जनादेश महासम्मेलन' का है.

इस सम्मेलन की फ़ाइल फ़ुटेज देखकर पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम के वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है और एडिटिंग की मदद से 'मोदी-मोदी के नारे' वीडियो में जोड़े गए हैं.

कार्यक्रम के असली वीडियो में अल्पेश ठाकोर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी का मंच पर औपचारिक तौर पर स्वागत करने के बाद माइक की ओर बढ़ते हैं.

सम्मेलन के 12वें मिनट में वो मंच से जनता को शांत रहने के लिए कहते हैं. वो कहते हैं कि अल्पेश ठाकोर और राहुल गांधी का सम्मान करते हैं तो भीड़ से कोई आवाज़ नहीं आनी चाहिए.

इसके बाद अल्पेश कहते हैं कि 'दाई ओर से अब भी आवाज़ आ रही है'. लोग उनकी ये अपील सुनकर चुप हो जाते हैं और क़रीब 10 सेकेंड बाद अल्पेश ठाकोर अपना भाषण शुरू करते हैं.

लेकिन कार्यक्रम के असली वीडियो में इस दौरान कहीं भी मोदी-मोदी के नारे सुनाई नहीं देते.

एडिटिंग की मदद से इस वीडियो में न सिर्फ़ 'मोदी-मोदी' के नारे डाले गए हैं, बल्कि कार्यक्रम की तारीख़ और नाम भी हटा दिया गया है.

एक ओर जहां विपक्षी पार्टियां मिलकर बीजेपी को हराना चाहती हैं वहीं कहा ये जा रहा है कि इस मक़सद को हासिल करने में सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद कांग्रेस पार्टी ही है.

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती और उनके सहयोगी अखिलेश यादव ने मंगलवार को कांग्रेस पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के बीच 'भ्रम की स्थिति' फैलाने का आरोप लगाया.

उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन कर लिया है. ये ऐसा गठबंधन नहीं है जिसे आसानी से तोड़ा जा सके. हालांकि सपा और बसपा उन क्षेत्रों में अपने भरोसेमंद प्रत्याशियों को उतारने में असफल रहे हैं जहां दोनों का अच्छा-ख़ासा वोट बैंक है.

कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये पूरी तरह से अलग-थलग है. कांग्रेस छोटी पार्टियों के साथ अपने अलग समीकरण बना रही है.

मिसाल के तौर पर देखें तो कांग्रेस की नई महासचिव प्रियंका गांधी ने अभी पिछले हफ़्ते ही भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को 'करिश्माई नेता' बताया और इसके बाद ये ख़बर आई कि कांग्रेस, सपा और बसपा के पीठ पीछे चंद्रशेखर को वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ाने की तैयारी करा रही थी.

अब सपा और बसपा पूछ रही हैं कि कांग्रेस को ऐसा करने का अधिकार किसने दिया?

इसके बाद कांग्रेस ने ऐलान किया कि उत्तर प्रदेश में वो लोकसभा की कम से कम सात सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी, तो मायावती ने इसका तंज़ के साथ स्वागत किया.

"कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के लिए स्वतंत्र है. हमारा गठबंधन (सपा-बसपा-आरएलडी) बीजेपी को हराने का माद्दा रखता है. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के लोगों में ये भ्रम फैलाना छोड़ देना चाहिए कि वो सात सीटें हमारे गठबंधन के लिए छोड़ रही है."

बसपा देश के दूसरे राज्यों जैसे पंजाब, आंध्र प्रदेश और हरियाणा में भी ग़ैर-बीजेपी, ग़ैर-कांग्रेस दलों के साथ गठबंध की संभावनाएं तलाश रही है.

मायावती ने कहा, "बसपा एक बार फिर ये स्पष्ट करना चाहती है कि हमारा कांग्रेस के साथ न तो उत्तर प्रदेश में और न ही देश के किसी और हिस्से में कोई गठबंधन है. हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस द्वारा लगभग रोज़-रोज़ फैलाए जा रहे भ्रमों से बचकर रहना चाहिए."

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी एक ट्वीट में मायावती का समर्थन किया.

उन्होंने लिखा, "एसपी, बीएसपी और आरएलडी मिलकर बीजेपी को उत्तर प्रदेश में हराने में सक्षम हैं. कांग्रेस पार्टी को किसी तरह का भ्रम फैलाने की ज़रूरत नहीं है."

कांग्रेस ने जन-अधिकार पार्टी से गठबंधन करके अपना दल से अलग हुए धड़े के लिए दो सीटें छोड़ने का ऐलान किया है.

पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती.
कांग्रेस ने बिहार के लिए भी नई महत्वाकांक्षा सजा ली हैं, जहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ख़ुद को सबसे बड़ी पार्टी मानते हुए बीजेपी और जेडीयू को सत्ता में आने से रोकने की बात कर रही है.

Tuesday, March 12, 2019

2019中国两会:代表和委员们的“抓眼球”提案

2019年中国“两会”日程已接近尾声,尽管每年在北京举行的两会常被外界批评为徒有其表的“橡皮图章”,但代表和委员们的一些提案还是会在网络上引起热议。

让我们看看今年有哪些吸引眼球的代表建言。

中国再次调低增长预期 多项刺激浮出水面
中国外长王毅评孟晚舟案中美关系及蔡英文访美
2019中国两会:围绕《外商投资法》的几大焦点
西藏书记称因健康原因限制外国人进藏
拒绝丑校服
据中国媒体报道,两会期间,中国国民党革命委员会(简称“民革”)向全国政协提交提案,建议改进中国校服的美感与舒适度。民革是接受中国共产党领导的“八大民主党派”之一。

民革的提案称,最新调研数据显示,国内校服目前的公众满意度低于30%。因此建议加强功能面料开发与校服款式设计,解决“千校一服”等问题

中国的校服一直是很多民众吐槽的对象。尽管中国当局并未统一中小学校服的样式,但中国中小学普遍采用样式臃肿、配色单一的运动服,很多网友将其称为“大口袋”。

“民革”在提案中建议,校服可结合中华传统文化,开发“有别于欧美日韩的校服款式”,以帮助中小学生“增强文化自信”。

该提案在网络上受到很多网友欢迎。

“终于有人重视这个问题了,太惊喜了,”一名网友说。“希望我的孩子将来上学有漂亮的校服穿,不要在机场被认为是运动会代表团。”

提高奢侈品税率
全国政协委员、宁夏政协主席崔波带来的提案是提高奢侈品税率。他建议通过立法手段,提高奢侈品税率,抑制奢侈浪费。

崔波说,中国很多年轻人节省一年,“就为了在奢侈品上一掷千金”。他表示,“举债消费、提前消费、过度消费让很多人成为‘月光族’。”

贝恩(Bain)咨询公司研究报告《2017年中国奢侈品市场研究》显示,2017年中国奢侈品销售额为1420亿美元,增速达20%,其市场规模仅次于美国,位居世界第二。

但崔波对于年轻人的“关怀”似乎并未得到很多网友买账。

“很多奢侈品本来不是奢侈品,就是因为税高才‘奢’了起来好吗?”一名微博网友评论道。

还有网友评论称,“看来崔委员还是不了解我们年轻人”。她称,自己认准的东西再贵也会买,高昂的奢侈品税率只会怂恿更多的中国人前往国外购物。

公职人员带头减肥
全国人大代表罗杰则将他的目光放到了“全民减重”上。他认为,中国应加大对健康管理的投入,设立专门的机构来做关于减重方面的工作。

据中国媒体《文汇报》报道,罗杰建议当局从行政、事业单位的公职人员入手,出台公职人员体重及健康管理规定:男性腰围超过33.5英寸(85厘米)、女性超过35.4英寸(90厘米),且血糖、血压、血脂出现任何一项不合格,必须在3个月内自行减肥。

罗杰建议,如果公职人员减肥失败,必须接受饮食控制教育;再过6个月还是超重,单位予以减薪;一年后仍然超标,必须“自动离职”。

罗杰的建议引发一些网友调侃。有网友说,公务员太胖“不是缺乏减重,而是闲的没事”。此外,也有网友对此建议表示支持。

“终于有人重视疾病的预防了。对国民整体健康来说,提前预防比后期治疗更重要,”一名网友评论道。

下调法定最低婚龄
在本次两会上,一名全国人大代表提交的关于修改法定结婚年龄的提议也引发外界关注。

全国人大代表丁列明建议,修改中国《婚姻法》第六条,将结婚年龄“男不得早于22周岁,女不得早于20周岁”,改为“男不得早于20周岁,女不得早于18周岁”,同时删除“晚婚晚育应予鼓励”。

Tuesday, March 5, 2019

पाकिस्तान की समुद्री सीमा कहाँ तक?

पाकिस्तानी नौसेना ने दावा किया है कि उसने भारतीय पनडुब्बी के अपने समुद्री सीमा में घुसने की कोशिश को नाकाम किया है.

पाक नौसेना के प्रवक्ता की ओर से जारी किए गए एक बयान में कहा गया है कि पाकिस्तानी समुद्री ज़ोन में भारतीय पनडुब्बी के मौजूद होने का सुराग मिला है और उसे पाकिस्तानी पानी में दाख़िल होने से रोक दिया गया.

पाकिस्तान का कहना है कि उसने जानबूझ कर भारतीय पनडुब्बी पर हमला नहीं किया क्योंकि वो इलाके में शांति चाहता है.

पाकिस्तान के इस दावे को भारतीय नौसेना ने प्रोपेगैंडा करार दिया है और खारिज कर दिया है.

भारतीय नौसेना का कहना है कि "हमारी तैनाती राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए होती है. बीते कुछ दिनों से पाकिस्तान झूठी ख़बरें फ़ैलाने में लगा है. हम इस तरह के किसी प्रोपेगैंडा का संज्ञान नहीं लेते. हमारी सेना की तैनाती बनी रहेगी."

लेकिन इस पूरे वाकये ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि आख़िर किसी देश की अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा क्या होती है, और पाकिस्तान की समुद्री सीमा क्या है?

अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा क्या है?
इस बारे में पाकिस्तानी नौसेना के पूर्व एडमिरल इफ़्तेख़ार राव ने बीबीसी को बताया कि किसी भी देश की समुद्री सीमाओं को अलग-अलग ज़ोन में बांटा जाता है.

देश के समुद्र तट पर एक बेसलाइन बनाई जाती है. उस बेसलाइन से 12 नॉटिकल मील समुद्र की ओर तक के पानी को टेरिटोरियल (अधीनस्थ क्षेत्र) वॉटर कहा जाता है. ये ही देश की रक्षात्मक समुद्री हद होती है.

ये बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे कि ज़मीनी सरहद, अंतर केवल पानी का होता है. इसकी सीमाएं समुद्री हद में होती हैं. 12 नॉटिकल मील के बाद के अगले 12 नॉटिकल मील को 'कन्टिग्यूअस ज़ोन' यानी 'साथ लगे इलाक़े' का पानी कहलाता है जो पारंपरिक रूप से चौबीस नॉटिकल मील बनता है.

इसमें किसी देश के कस्टम और व्यापार से जुड़े क़ानून लागू होते हैं.

पूर्व एडमिरल इफ़्तेख़ार राव के मुताबिक़ एक तीसरा ज़ोन भी होता है जो विशेष आर्थिक ज़ोन कहलाता है. इसकी सीमा उस देश की बेसलाइन से 200 नॉटिकल मील आगे तक होती है.

इस क्षेत्र मे कोई भी देश सिर्फ़ आर्थिक गतिविधियां कर सकता है, जैसे कि तेल की खोज या मछली पकड़ना आदि.

इससे भी आगे फिर एक्सटेंशन ऑफ़ कांटिनेंटल शेल्फ़ (Extension of Continental Shelf) की सीमा शुरू हो जाती है. इसमें भी संयुक्त राष्ट्र के तहत उस देश को समुद्र पर कुछ अधिकार हासिल होते हैं.

इफ़्तेख़ार राव बताते हैं कि अन्य देशों की तरह पाकिस्तान की समुद्री सीमाएं भी इसी आधार पर तय की गई हैं. यानी एक्सटेंशन ऑफ़ कांटिनेंटल शेल्फ़ तक पाकिस्तान की समद्री सीमाएं हैं.

पाकिस्तान ने एंक्सटेंशन ऑफ़ कांटिनेंटल शेल्फ़ के लिए संयुक्त राष्ट्र में याचिका दी थी जो मंज़ूर हो गई है.

अंतरराष्ट्रीय साझा पानी या सीमाएं क्या हैं?
किसी भी देश के टेरिटोरियल वॉटर यानी सुरक्षात्मक समुद्री सीमा और कन्टिग्यूअस ज़ोन में किसी और देश के जंगी जहाज़ों और पनडुब्बियों को दाख़िल होने की अनुमति नहीं होती है. हालांकि अन्य देशों के मालवाहक जहाज़ों को इस पानी से गुज़रने की इजाज़त दी जा सकती है.

एडमिरल राव का कहना है कि समुद्र तो बहुत बड़ा है लिहाज़ा विशेष आर्थिक ज़ोन यानी 200 नॉटिकल मील से आगे के समंदर को 'कॉमन हेरीटेज़ ऑफ़ मैनकाइंड' यानी मानवता की साझा विरासत कहा जाता है.

ये समुद्र सभी देशों के लिए साझा है और इस पानी में किसी भी देश के कोई भी जहाज़ जा सकते हैं.

राव बताते हैं कि विशेष आर्थिक ज़ोन एक ऐसा इलाक़ा है जहां कोई दूसरा देश आर्थिक गतिविधियां नहीं कर सकता, अलबत्ता इस पानी से किसी भी दूसरे देश के मालवाहक और जंगी जहाज़ गुज़र सकते हैं.

लेकिन यहां किसी पनडुब्बी को पानी के नीचे गुज़रने की इजाज़त नहीं होती. अगर उसे गुज़रना है तो पानी के ऊपर से ही गुज़रना होता है.

राव कहते हैं कि इसे 'इन्सेंट पैसेज' कहा जाता है. ये भी सुयंक्त राष्ट्र के समुद्री क़ानूनों के मुताबिक ही है.

शांति या तनावः दुश्मन के जंगी जहाज़ रोकने का तरीक़ा क्या है?
ए़़डमिरल राव कहते हैं कि अगर हम भारतीय पनडुब्बी के पाकिस्तानी पानी में घुसने की कथित घटना की बात करें तो ये पनडुब्बी पाकिस्तान की सुरक्षात्मक समुद्री सीमा में नहीं थी.

लेकिन ये पाकिस्तान के विशेष आर्थिक ज़ोन के भीतर थी लिहाज़ा जैसा कि आजकल तनाव का माहौल है तो पाकिस्तान अगर उस पनडुब्बी का पता लगाने के बाद उसे निशाना बनाता तो ये अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन नहीं होता. क्योंकि किसी पनडुब्बी का सुराग लगाना और उस पर नज़र रखना बेहद मुश्किल काम है.

金正恩:朝鲜领导人“病危”说的来龙去脉

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