73 साल के प्रकाश पिछले दो महीने से मुहल्ले में घूम-घूमकर अपने चुनाव प्रचार अभियान के लिए समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैं लोगों को बस ये दिखाना चाहता हूं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पार्टी पॉलिटिक्स ही एकमात्र रास्ता नहीं है. मेरी योजना देश को अपने जैसे स्वतंत्र उम्मीदवार देने की है. देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करने का सिर्फ़ यही रास्ता है."
प्रकाश कोंडेकर एक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं जहां तीसरे चरण में 23 मई को वोटिंग होगी. वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि वो एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे.
उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है तो वो भारत के हर नागरिक को 17,000 रुपये देंगे. प्रकाश का मानना है कि अगर सरकार बाकी के कुछ खर्चों में कटौती कर देता तो ये वादा पूरा करना काफ़ी आसान होगा.
साल 1980 तक प्रकाश महाराष्ट्र के बिजली विभाग में काम करते थे. अब उन्हें अक्सर पुणे की गलियों में साइनबोर्ड लगी स्टील की एक गाड़ी धकेलते देखा जा सकता है.
स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले इस साइनबोर्ड पर 100 रुपये दान करने की अपील लगी होती थी. लेकिन आजकल इस बोर्ड पर 'जूते को जिताएं' लिखा रहता है.
प्रकाश कोंडेकर का चुनाव चिह्न जूता है, जो उन्हें निर्वाचन आयोग ने दिया है.
कई लोगों के लिए शहर की गलियों में दिखने वाला ये नज़ारा देखकर हंसी आती है. कुछ लोग उन्हें नज़रअंदाज़ करते हैं तो कुछ उनके साथ सेल्फ़ी लेना चाहते हैं. प्रकाश सेल्फ़ी के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है इससे सोशल मीडिया पर मुफ़्त में पब्लिसिटी मिल जाएगी.
कुछ लोग प्रकाश का हुलिया देखकर उनका मज़ाक भी बनाते हैं: एक कमज़ोर और बुजुर्ग आदमी, जिसके सफ़ेद बाल बिखरे हुए हैं और दाढ़ी बढ़ी हुई है. प्रकाश अप्रैल की चिलचिलाती धूप में सिर्फ़ सूती शॉर्ट्स पहने अपने चुनावी अभियान में जुटे हुए हैं.
और हां, प्रकाश कोंडेकर इससे पहले 24 अलग-अलग चुनाव लड़ चुके हैं और हार भी चुके हैं. उन्होंने संसदीय चुनाव से लेकर स्थानीय निकाय के चुनाव, सबमें अपनी दावेदारी पेश की है.
प्रकाश उन सैकड़ों निर्दलीय प्रत्याशियों में शामिल हैं जो इस बार के लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं. 2014 के आम चुनाव में 3,000 स्वतंत्र उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था जिसमें से सिर्फ़ तीन लोग चुनाव जीते थे.
वैसे, साल 1957 का चुनाव ऐसा था जिसमें बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी. इस चुनाव में 42 निर्दलीय उम्मीदवार बतौर सांसद चुने गए थे.
साल 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद से अब तक भारत में 44,962 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनावी समर में हिस्सा लिया है लेकिन इनमें से सिर्फ़ 222 को जीत हासिल हुई.
भारत में निर्दलीय उम्मीदवार बमुश्किल ही जीत पाते हैं क्योंकि उनके पास राजनीतिक पार्टियों की तुलना में पैसे और संसाधन बहुत कम होते हैं. इसके अलावा देश में पार्टियों की कोई नहीं हैं. भारत में तक़रीबन 2,293 पंजीकृत क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां हैं. जिनमें सात राष्ट्रीय और 59 क्षेत्रीय पार्टियां हैं.
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और विपक्षी कांग्रेस देश को दो प्रमुख राष्ट्रीय दल हैं लेकिन कई राज्यों में मज़बूत क्षेत्रीय पार्टियां और लोकप्रिय क्षेत्रीय नेता भी हैं.
हालांकि प्रकाश कोंडेकर का कहना है कि उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई है जिससे उन्हें फ़ायदे की उम्मीद है.
चुनाव के नियमों के मुताबिक़ लिस्ट में पहले राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवारों का नाम होता है फिर क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारों का. निर्दलीय उम्मीदवारों का नाम सबसे नीचे होता है.
प्रकाश कहते हैं, "मेरी लोगों से गुज़ारिश है कि वो लिस्ट में मौजूद आख़िरी उम्मीदवार को वोट दें. ये नाम 'नोटा' के पहले लिखा होगा और ये निर्दलीय उम्मीदवार का नाम होगा."
23 अप्रैल को होने वाले चुनाव के ले उन्होंने अपना सरनेम 'Znyosho' कर लिया ताकि उनका नाम लिस्ट में सबसे नीचे आए.
तमाम कठिनाइयों और नुक़सानों के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार हर चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और इसकी कई वजहें हैं:
कुछ के लिए ये अहम का मुद्दा होता है तो कइयों को राजनीतिक दल ही मैदान में उतारते हैं ताकि उनकी विपक्षी पार्टियों के वोट बंट जाएं.
इसके अलावा के.पद्मराजन जैसे लोग हैं जिनके लिए चुनाव लड़ना एक स्टंट की तरह है. वो अब तक 170 से ज़्यादा चुनावों में हिस्सा लेकर हार चुके हैं. इसके पीछे उनका सिर्फ़ एक मक़सद है- गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज करवाना.
पद्मराजन वायनाड में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं. वो कहते हैं कि अगर वो चुनाव जीत गए उन्हें हार्ट अटैक आ जाएगा.
कई निर्दलीय उम्मीदवारों के इस रवैये को देखते हुए भारतीय विधि आयोग ने संसदीय चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने की सिफ़ारिश तक के लिए मजबूर कर दिया लेकिन ऐसा कभी हो नहीं सका.
जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है वैसे-वैसे निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ रही है लेकिन उनके जीत की दर में कोई बढ़त नहीं हो रही है.
'निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में नहीं भारत की चुनावी व्यवस्था'
इस बारे में चुनावों पर नज़र रखने वाली संस्था असोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीप चोकर कहते हैं कि राजनीतिक दलों की भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर पकड़ बहुत मज़बूत है..
चोकर कहते हैं, "निर्दलीय उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के रास्ते में कई मुश्किलें, विरोधाभास और दुविधाएं हैं. मसलन, एक उम्मीदवार अपने चुनाव प्रचार के लिए कितने पैसे खर्च कर सकता है, इसकी एक सीमा है लेकिन उन्हें समर्थन दे रही है राजनीतिक पार्टियों के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है. राजनीतिक पार्टियों की तरह निर्दलीय उम्मीदवारों को आयकर में छूट भी नहीं मिलती."
चोकर कहते हैं कि कुछ ऐसे निर्दलीय उम्मीदवार ज़रूर हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं लेकिन फंडिंग की सीमाओं, दबदबे की कमी और लोगों की अवधारणा की वजह से पार्टियां उनकी जीत की राह में बाधा बन जाती हैं.
पिछले कई सालों में उन्होंने अपने चुनावी अभियान की ख़ातिर पैसे जुटाने के लिए अपने पुरखों की ज़मीन बेच दी. नामांकन भरते वक़्त प्रकाश ने अपने हलफ़नामे में जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक़ उन्हें हर महीने 1,921 रुपये पेंशन मिलती है.
कोंडेकर मानते हैं कि उनका चुनाव लड़ना अपने आप में सांकेतिक है लेकिन लगातार मिलने वाली हार के बावजूद वो उम्मीद छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
वो कहते हैं, "ये राजनीतिक पार्टियों की लोहे की तलवार और पेरे काग़ज़ के पुतले के बीच की लड़ाई है लेकिन मैं कोशिश करता रहूंगा. अपनी उम्र को देखकर कहूं तो मुमकिन है कि ये मेरा आख़िरी चुनाव है लेकिन हो सकता है कि इस बार चीजें अलग हों."
Monday, April 22, 2019
Tuesday, April 16, 2019
केशव प्रसाद मौर्य: 23 मई के बाद बनवानी पड़ेगी अलग जेल
उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए सरकार उसमें कुछ नहीं कर सकती.
बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा, "अयोध्या में हम बाबर के नाम पर एक ईंट भी नहीं लगने देंगे. भव्य मंदिर भी बनेगा. चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए हमारी विवशता है. यदि सरकार को मंदिर बनाना होता तो शपथ ग्रहण के अगले दिन हम लोग कार सेवा शुरू कर देते."
इस सवाल पर कि क्या उनका मतदाता इस बारे में सवाल नहीं करेगा कि केंद्र और राज्य से लेकर स्थानीय निकाय तक में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद राम मंदिर के निर्माण को लेकर कुछ नहीं किया गया, केशव प्रसाद का जवाब था, "हमारे मतदाता को सब पता है कि हमने क्या किया है और क्या कर रहे हैं."
बातचीत में केशव प्रसाद मौर्य ने यहा दावा भी किया है कि लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को कांग्रेस या गठबंधन से कोई चुनौती नहीं मिल रही है और बीजेपी के नेतृत्व वाला गठबंधन एनडीए इस बार 2014 के लोकसभा चुनाव से भी ज़्यादा सीटें जीतेगा.
उन्होंने स्वीकार किया कि समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के चलते पिछले साल हुए लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की तीन सीटों पर हार हुई थी लेकिन कहा कि आम चुनाव में ऐसा नहीं होगा.
पिछले साल हुए उप चुनाव में बीजेपी जिन तीन सीटों- फूलपुर, गोरखपुर और कैराना में हारी थी, उनमें फूलपुर लोकसभा सीट केशव प्रसाद मौर्य के ही इस्तीफ़े से ख़ाली हुई थी.
केशव प्रसाद मौर्य इस आत्मविश्वास की वजह बताते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकरार ने जो काम किया है, उसकी वजह से हम जीतेंगे. तमाम योजनाओं का लाभ देश की पचासी प्रतिशत जनता को सीधे तौर पर हुआ है."
विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि गठबंधन स्वार्थ पर टिका है, उसमें जनता का हित कहीं भी शामिल नहीं है.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल रही है. लोकशाही में भी वो लोग राजशाही के स्वभाव के लोग हैं. कांग्रेसी पांच वर्ष विपक्ष में रहते हुए सत्ता में आने के लिए बेचैन हैं लेकिन 23 मई के बाद जो लोग बेल पर हैं, उनकी संख्या इतनी ज़्यादा हो जाएगी कि प्रधानमंत्री को एक अलग जेल बनवानी पड़ेगी."
सरकार की इतनी उपलब्धियों के बावजूद पार्टी के नेता उपलब्धियां गिनाने की बजाय पुरानी सरकारों, ख़ासकर कांग्रेसी सरकारों को ज़्यादा कोस रहे हैं.
इस सवाल पर उनका कहना था, "अगर उनकी नाकामी नहीं बताएंगे तो हमारी उपलब्धि का अंतर किसी को कैसे पता चलेगा? जब तक मोदी जी देश के प्रधानमंत्री नहीं बने थे, कोई कांग्रेसी किसी मंदिर में माथा टेकता था क्या? उसे मंदिर से जैसे घृणा होती थी, हिन्दू से घृणा होती थी. लेकिन आज जनेऊधारी भी बनते हैं, अपने को भोलेनाथ का भक्त भी बताते हैं."
लेकिन आए दिन होने वाले अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधी कहां से आ रहे हैं, इस सवाल के जवाब में उनका कहना था, "अपराध जो कर रहे हैं, उन्हें दंड मिल रहा है. सपा की सरकार की तरह यहां अपराधियों को संरक्षण नहीं मिल रहा है."
विपक्षी गठबंधन से ज़्यादा केशव प्रसाद मौर्य कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं पर हमलावर दिखते हैं.
पूरी बातचीत के दौरान उनका निशाना गांधी परिवार के ही सदस्य रहे, राज्य स्तरीय नेता नहीं.
प्रियंका गांधी की राजनीति में सक्रियता की वजह से बीजेपी में रणनीतिक स्तर पर भले ही मंथन चल रहा हो लेकिन केशव मौर्य प्रियंका गांधी की राजनीतिक अहमियत को कोई तवज्जो नहीं देते.
वो कहते हैं, "प्रियंका गांधी का कोई प्रभाव नहीं है. कांग्रेस अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुकी है. अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. इस चुनाव के बाद शायद वो कहीं दिखे भी न."
केशव प्रसाद मौर्य साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत के वक़्त पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे.
पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेताओं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं की कथित अनदेखी के सवाल को ये कहकर टाल देते हैं कि इस तरह के फ़ैसले पार्टी की उच्चाधिकार समिति में तय किए जाते हैं, न कि किसी एक व्यक्ति के कहने पर.
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दल 'अपना दल (एस)' को दो सीटें दी हैं जबकि सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) और हाल ही में एनडीए में शामिल निषाद पार्टी के साथ अब तक सीटों का तालमेल नहीं हो सका है.
बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा, "अयोध्या में हम बाबर के नाम पर एक ईंट भी नहीं लगने देंगे. भव्य मंदिर भी बनेगा. चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए हमारी विवशता है. यदि सरकार को मंदिर बनाना होता तो शपथ ग्रहण के अगले दिन हम लोग कार सेवा शुरू कर देते."
इस सवाल पर कि क्या उनका मतदाता इस बारे में सवाल नहीं करेगा कि केंद्र और राज्य से लेकर स्थानीय निकाय तक में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद राम मंदिर के निर्माण को लेकर कुछ नहीं किया गया, केशव प्रसाद का जवाब था, "हमारे मतदाता को सब पता है कि हमने क्या किया है और क्या कर रहे हैं."
बातचीत में केशव प्रसाद मौर्य ने यहा दावा भी किया है कि लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को कांग्रेस या गठबंधन से कोई चुनौती नहीं मिल रही है और बीजेपी के नेतृत्व वाला गठबंधन एनडीए इस बार 2014 के लोकसभा चुनाव से भी ज़्यादा सीटें जीतेगा.
उन्होंने स्वीकार किया कि समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के चलते पिछले साल हुए लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की तीन सीटों पर हार हुई थी लेकिन कहा कि आम चुनाव में ऐसा नहीं होगा.
पिछले साल हुए उप चुनाव में बीजेपी जिन तीन सीटों- फूलपुर, गोरखपुर और कैराना में हारी थी, उनमें फूलपुर लोकसभा सीट केशव प्रसाद मौर्य के ही इस्तीफ़े से ख़ाली हुई थी.
केशव प्रसाद मौर्य इस आत्मविश्वास की वजह बताते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकरार ने जो काम किया है, उसकी वजह से हम जीतेंगे. तमाम योजनाओं का लाभ देश की पचासी प्रतिशत जनता को सीधे तौर पर हुआ है."
विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि गठबंधन स्वार्थ पर टिका है, उसमें जनता का हित कहीं भी शामिल नहीं है.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल रही है. लोकशाही में भी वो लोग राजशाही के स्वभाव के लोग हैं. कांग्रेसी पांच वर्ष विपक्ष में रहते हुए सत्ता में आने के लिए बेचैन हैं लेकिन 23 मई के बाद जो लोग बेल पर हैं, उनकी संख्या इतनी ज़्यादा हो जाएगी कि प्रधानमंत्री को एक अलग जेल बनवानी पड़ेगी."
सरकार की इतनी उपलब्धियों के बावजूद पार्टी के नेता उपलब्धियां गिनाने की बजाय पुरानी सरकारों, ख़ासकर कांग्रेसी सरकारों को ज़्यादा कोस रहे हैं.
इस सवाल पर उनका कहना था, "अगर उनकी नाकामी नहीं बताएंगे तो हमारी उपलब्धि का अंतर किसी को कैसे पता चलेगा? जब तक मोदी जी देश के प्रधानमंत्री नहीं बने थे, कोई कांग्रेसी किसी मंदिर में माथा टेकता था क्या? उसे मंदिर से जैसे घृणा होती थी, हिन्दू से घृणा होती थी. लेकिन आज जनेऊधारी भी बनते हैं, अपने को भोलेनाथ का भक्त भी बताते हैं."
लेकिन आए दिन होने वाले अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधी कहां से आ रहे हैं, इस सवाल के जवाब में उनका कहना था, "अपराध जो कर रहे हैं, उन्हें दंड मिल रहा है. सपा की सरकार की तरह यहां अपराधियों को संरक्षण नहीं मिल रहा है."
विपक्षी गठबंधन से ज़्यादा केशव प्रसाद मौर्य कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं पर हमलावर दिखते हैं.
पूरी बातचीत के दौरान उनका निशाना गांधी परिवार के ही सदस्य रहे, राज्य स्तरीय नेता नहीं.
प्रियंका गांधी की राजनीति में सक्रियता की वजह से बीजेपी में रणनीतिक स्तर पर भले ही मंथन चल रहा हो लेकिन केशव मौर्य प्रियंका गांधी की राजनीतिक अहमियत को कोई तवज्जो नहीं देते.
वो कहते हैं, "प्रियंका गांधी का कोई प्रभाव नहीं है. कांग्रेस अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुकी है. अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. इस चुनाव के बाद शायद वो कहीं दिखे भी न."
केशव प्रसाद मौर्य साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत के वक़्त पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे.
पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेताओं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं की कथित अनदेखी के सवाल को ये कहकर टाल देते हैं कि इस तरह के फ़ैसले पार्टी की उच्चाधिकार समिति में तय किए जाते हैं, न कि किसी एक व्यक्ति के कहने पर.
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दल 'अपना दल (एस)' को दो सीटें दी हैं जबकि सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) और हाल ही में एनडीए में शामिल निषाद पार्टी के साथ अब तक सीटों का तालमेल नहीं हो सका है.
Tuesday, April 9, 2019
मधेपुरा के 'कुरुक्षेत्र' में तीन यादवों के बीच 'महाभारत'
बिहार के यादव बहुल मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में उभरे सियासी अवसरवाद ने इस बार जातीय गणित के कुछ आज़माए हुए सूत्र भी उलट-पलट दिए हैं.
पिछले लोकसभा चुनाव में यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के टिकट पर निर्वाचित सांसद राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार हैं.
इन्होंने उस समय जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के शरद यादव को पराजित किया था. लेकिन अब जेडीयू छोड़ चुके शरद यादव आरजेडी के प्रत्याशी हैं.
'उसूलों को मारो गोली' वाले सियासी दौर में नेताओं के लिए स्वार्थ तो सर्वोपरि होता ही है.
सियासत की इस उलटचाल से जहाँ पप्पू यादव के चेहरे का चुनावी रंग उड़ा हुआ है, वहीं शरद यादव के ही शिष्य दिनेश चंद्र यादव को जेडीयू-प्रत्याशी बन जाने का अच्छा मौक़ा हाथ लगा है.
दरअसल हुआ ये कि आरजेडी, कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के महागठबंधन से जुड़ कर चुनाव लड़ने की चाहत पाल रहे पप्पू यादव को तेजस्वी यादव ने अंतत: झटका दे दिया.
इसके पीछे की कहानी ये है कि मधेपुरा से सांसद चुने जाने के कुछ ही समय बाद पप्पू यादव द्वारा अपनी एक अलग पार्टी बना लेने को आरजेडी ने विश्वासघात माना है.
उधर, नीतीश कुमार से रिश्ता तोड़ने के बाद लालू यादव की तरफ़ रुख़ कर चुके शरद यादव आरजेडी के ज़्यादा अनुकूल हो गए हैं.
ऐसे में कांग्रेस से बेहतर रिश्ते के बावजूद पप्पू यादव अपने 'जन अधिकार पार्टी' को महागठबंधन के साथ नही जोड़ पाए.
इसलिए उन्हें निर्दलीय हो कर चुनाव मैदान में उतरना पड़ा है.
बग़ल के सुपौल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की निवर्तमान सांसद और पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को पार्टी ने फिर से उम्मीदवार बनाया है.
लेकिन सुपौल की अंदरूनी राजनीति समझने वाले यही मानते है कि इसबार रंजीत रंजन अपनी सीट शायद ही निकाल पाएंगी.
मधेपुरा में फँसा विवाद इसका मुख्य कारण बना है. यानी पति पत्नी दोनों को जिन चुनौतियों से सामना करना पड़ रहा है, उनके सूत्र मुख्यत: यादव मतदाताओं से ही जुड़े हुए हैं.
आरजेडी समर्थक यादव मतदाताओं के स्थानीय प्रवक्ता खुल कर बयान दे रहे हैं कि आरजेडी प्रत्याशी शरद यादव को नुक़सान पहुँचाना पप्पू यादव और रंजीत रंजन दोनों को महँगा पड़ेगा.
दूसरी तरफ़ पप्पू यादव के विरोधी भी ये क़बूल करते हैं कि इस इलाक़े का ये अकेला नेता है, जो अपने क्षेत्र में ही नहीं, क्षेत्र से बाहर भी लोगों को रोग-शोक या संकट के समय हर तरह से मदद करने को तत्पर रहता है.
उनके एक पुराने राजनीतिक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि पप्पू यादव ज़्यादा बोलने के क्रम में अक्सर कुछ उटपटांग बोल कर बहुतों को अपने विरुद्ध कर लेते हैं.
बावजूद कुछ ख़ूबियों के, पप्पू यादव की बाहुबली वाली पुरानी आपराधिक छवि उनका पीछा नहीं छोड़ रही है.
आज भी कई लोग उन्हें 'लंपट-छाप युवाओं' का झुंड लेकर चलने वाला गरम मिज़ाज नेता क़रार देते हैं. इस बीच मामला कुछ और बिगड़ा है.
लालू यादव से प्रतिबद्ध यादव समाज की मुख्यधारा से कट चुके पप्पू यादव को मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिलना मुश्किल है.
ज़ाहिर है कि अब लालू-ख़ेमा ज्वॉइन कर लेने वाले शरद यादव का पलड़ा भारी करने में यादव और मुस्लिम के अलावा कोइरी-कुशवाहा और मल्लाह वाला जातीय महागठबंधन पूरा ज़ोर लगाएगा.
जेडीयू के उम्मीदवार दिनेश यादव नीतीश सरकार में मंत्री हैं और कोशी क्षेत्र के ही निवासी होने के नाते यहाँ कई तबक़ों में इनकी अच्छी पैठ है.
लेकिन इनके पक्ष में जो सबसे अनुकूल चुनावी समीकरण उभरने लगे हैं, उनकी जातिगत और भावनात्मक एकजुटता वाली ताक़त महागठबंधन के मुक़ाबले काफ़ी बढ़ी हुई दिखती है.
18 लाख 74 हज़ार मतदाताओं वाले मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में 22 % यादव और 12 % मुस्लिम वोटर बताए जाते हैं.
बाक़ी 2 से 7 प्रतिशत वोटर वाली 14 जातियों में सवर्ण और दलित समेत अन्य पिछड़ी जातियों से जुड़े मतदाताओं की तादाद यादव-मुस्लिम वोटर के मुक़ाबले दुगुना से भी कुछ ज़्यादा ही है.
इसलिए हालात ऐसे बनाए जा रहे हैं कि महागठबंधन के पक्ष में एकजुट दिख रही यादव-मुस्लिम जमात के ख़िलाफ़ ग़ैरयादव हिंदूओं का ध्रुवीकरण हो जाए.
ख़ासकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की तरफ़ अतिपिछड़ों और सवर्णों के सम्मिलित रुझान को 'राष्ट्रवादी मुहिम' के बूते और ताक़तवर बनाने में दिनेश यादव जुटे हए हैं.
दिलचस्प यह भी है कि इनकी चुनावी नैया यादवों के बजाय ब्राह्मण, राजपूत और पचपनियां कहे जाने वाले ग़ैरयादव पिछड़ों के सहारे पार लग सकती है.
यहाँ मुक़ाबले को तिकोना बनाने वाले तीनों प्रत्याशी एक ही जाति के हैं और यह भी ग़ौरतलब है कि मधेपुरा संसदीय क्षेत्र से अबतक यादव उम्मीदवार ही चुनाव जीतता रहा है.
पिछले लोकसभा चुनाव में आरजेडी के पप्पू यादव को 36%, जेडीयू के शरद यादव को 31% और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विजय कुशवाहा को 25% वोट मिले थे.
उस समय जेडीयू से बीजेपी अलग हो चुकी थी. अगर दोनों पार्टियाँ साथ होतीं तो परिणाम उनके हक़ में जा सकता था.
वैसे भी, कुल मिलाकर मधेपुरा की मौजूदा चुनावी तस्वीर जेडीयू को अभी अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों से अधिक चमकदार तो दिखा ही रही है.
पिछले लोकसभा चुनाव में यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के टिकट पर निर्वाचित सांसद राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार हैं.
इन्होंने उस समय जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के शरद यादव को पराजित किया था. लेकिन अब जेडीयू छोड़ चुके शरद यादव आरजेडी के प्रत्याशी हैं.
'उसूलों को मारो गोली' वाले सियासी दौर में नेताओं के लिए स्वार्थ तो सर्वोपरि होता ही है.
सियासत की इस उलटचाल से जहाँ पप्पू यादव के चेहरे का चुनावी रंग उड़ा हुआ है, वहीं शरद यादव के ही शिष्य दिनेश चंद्र यादव को जेडीयू-प्रत्याशी बन जाने का अच्छा मौक़ा हाथ लगा है.
दरअसल हुआ ये कि आरजेडी, कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के महागठबंधन से जुड़ कर चुनाव लड़ने की चाहत पाल रहे पप्पू यादव को तेजस्वी यादव ने अंतत: झटका दे दिया.
इसके पीछे की कहानी ये है कि मधेपुरा से सांसद चुने जाने के कुछ ही समय बाद पप्पू यादव द्वारा अपनी एक अलग पार्टी बना लेने को आरजेडी ने विश्वासघात माना है.
उधर, नीतीश कुमार से रिश्ता तोड़ने के बाद लालू यादव की तरफ़ रुख़ कर चुके शरद यादव आरजेडी के ज़्यादा अनुकूल हो गए हैं.
ऐसे में कांग्रेस से बेहतर रिश्ते के बावजूद पप्पू यादव अपने 'जन अधिकार पार्टी' को महागठबंधन के साथ नही जोड़ पाए.
इसलिए उन्हें निर्दलीय हो कर चुनाव मैदान में उतरना पड़ा है.
बग़ल के सुपौल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की निवर्तमान सांसद और पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को पार्टी ने फिर से उम्मीदवार बनाया है.
लेकिन सुपौल की अंदरूनी राजनीति समझने वाले यही मानते है कि इसबार रंजीत रंजन अपनी सीट शायद ही निकाल पाएंगी.
मधेपुरा में फँसा विवाद इसका मुख्य कारण बना है. यानी पति पत्नी दोनों को जिन चुनौतियों से सामना करना पड़ रहा है, उनके सूत्र मुख्यत: यादव मतदाताओं से ही जुड़े हुए हैं.
आरजेडी समर्थक यादव मतदाताओं के स्थानीय प्रवक्ता खुल कर बयान दे रहे हैं कि आरजेडी प्रत्याशी शरद यादव को नुक़सान पहुँचाना पप्पू यादव और रंजीत रंजन दोनों को महँगा पड़ेगा.
दूसरी तरफ़ पप्पू यादव के विरोधी भी ये क़बूल करते हैं कि इस इलाक़े का ये अकेला नेता है, जो अपने क्षेत्र में ही नहीं, क्षेत्र से बाहर भी लोगों को रोग-शोक या संकट के समय हर तरह से मदद करने को तत्पर रहता है.
उनके एक पुराने राजनीतिक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि पप्पू यादव ज़्यादा बोलने के क्रम में अक्सर कुछ उटपटांग बोल कर बहुतों को अपने विरुद्ध कर लेते हैं.
बावजूद कुछ ख़ूबियों के, पप्पू यादव की बाहुबली वाली पुरानी आपराधिक छवि उनका पीछा नहीं छोड़ रही है.
आज भी कई लोग उन्हें 'लंपट-छाप युवाओं' का झुंड लेकर चलने वाला गरम मिज़ाज नेता क़रार देते हैं. इस बीच मामला कुछ और बिगड़ा है.
लालू यादव से प्रतिबद्ध यादव समाज की मुख्यधारा से कट चुके पप्पू यादव को मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिलना मुश्किल है.
ज़ाहिर है कि अब लालू-ख़ेमा ज्वॉइन कर लेने वाले शरद यादव का पलड़ा भारी करने में यादव और मुस्लिम के अलावा कोइरी-कुशवाहा और मल्लाह वाला जातीय महागठबंधन पूरा ज़ोर लगाएगा.
जेडीयू के उम्मीदवार दिनेश यादव नीतीश सरकार में मंत्री हैं और कोशी क्षेत्र के ही निवासी होने के नाते यहाँ कई तबक़ों में इनकी अच्छी पैठ है.
लेकिन इनके पक्ष में जो सबसे अनुकूल चुनावी समीकरण उभरने लगे हैं, उनकी जातिगत और भावनात्मक एकजुटता वाली ताक़त महागठबंधन के मुक़ाबले काफ़ी बढ़ी हुई दिखती है.
18 लाख 74 हज़ार मतदाताओं वाले मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में 22 % यादव और 12 % मुस्लिम वोटर बताए जाते हैं.
बाक़ी 2 से 7 प्रतिशत वोटर वाली 14 जातियों में सवर्ण और दलित समेत अन्य पिछड़ी जातियों से जुड़े मतदाताओं की तादाद यादव-मुस्लिम वोटर के मुक़ाबले दुगुना से भी कुछ ज़्यादा ही है.
इसलिए हालात ऐसे बनाए जा रहे हैं कि महागठबंधन के पक्ष में एकजुट दिख रही यादव-मुस्लिम जमात के ख़िलाफ़ ग़ैरयादव हिंदूओं का ध्रुवीकरण हो जाए.
ख़ासकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की तरफ़ अतिपिछड़ों और सवर्णों के सम्मिलित रुझान को 'राष्ट्रवादी मुहिम' के बूते और ताक़तवर बनाने में दिनेश यादव जुटे हए हैं.
दिलचस्प यह भी है कि इनकी चुनावी नैया यादवों के बजाय ब्राह्मण, राजपूत और पचपनियां कहे जाने वाले ग़ैरयादव पिछड़ों के सहारे पार लग सकती है.
यहाँ मुक़ाबले को तिकोना बनाने वाले तीनों प्रत्याशी एक ही जाति के हैं और यह भी ग़ौरतलब है कि मधेपुरा संसदीय क्षेत्र से अबतक यादव उम्मीदवार ही चुनाव जीतता रहा है.
पिछले लोकसभा चुनाव में आरजेडी के पप्पू यादव को 36%, जेडीयू के शरद यादव को 31% और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विजय कुशवाहा को 25% वोट मिले थे.
उस समय जेडीयू से बीजेपी अलग हो चुकी थी. अगर दोनों पार्टियाँ साथ होतीं तो परिणाम उनके हक़ में जा सकता था.
वैसे भी, कुल मिलाकर मधेपुरा की मौजूदा चुनावी तस्वीर जेडीयू को अभी अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों से अधिक चमकदार तो दिखा ही रही है.
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