भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पोस्टर-बैनरों पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र और राहुल गांधी के चाचा संजय गांधी की तस्वीरें आम नहीं हैं.
ख़ास तौर से संजय की पत्नी मेनका और पुत्र वरुण गांधी के पारिवारिक खटपट के बाद भाजपा में चले जाने के बाद से संजय गांधी का चेहरा पार्टी के आधिकारिक बैनरों से लापता हो गया है.
मध्य प्रदेश में सोमवार को कमलनाथ ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर किसानों की कर्ज़माफ़ी का वादा पूरा करने का ऐलान कर दिया है. लेकिन भोपाल की सड़कों पर चर्चा एक बैनर की भी हो रही है, जिसमें नए मुख्यमंत्री कमलनाथ का अभिनंदन करते हुए साथ में संजय गांधी की तस्वीर लगाई गई है. यह तस्वीर सोमवार को अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने छापी है.
संजय गांधी की यह तस्वीर अकारण नहीं है, क्योंकि कमलनाथ की कहानी संजय गांधी से उनकी क़रीबी के क़िस्से के बग़ैर अधूरी है.
गांधी परिवार से क़रीबी
कई पत्रकार पुष्टि करते हैं कि इंदिरा गांधी के दौर में कुछ समय के लिए यह नारा भी लगा करता था कि 'इंदिरा गांधी के दो हाथ, संजय गांधी और कमल नाथ.'
कमलनाथ को 1980 में छिंदवाड़ा से गार्गी शंकर मिश्रा की जगह टिकट दिया गया था. जबकि गार्गी उन नेताओं में थे जो कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल 1977 के चुनाव में भी जीतकर आए थे. 1977 में जनता पार्टी की ऐसी लहर थी कि इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि कमलनाथ के पहले चुनाव के लिए इंदिरा गांधी प्रचार करने छिंदवाड़ा गई थीं और उन्होंने एक सभा में कहा था कि लोग उनके तीसरे बेटे कमलनाथ को चुनाव जिताएं.
1980 के दशक में कांग्रेस की ओर से कई युवा सांसद जीतकर आए थे, जिनमें कमलनाथ भी थे. विपक्ष ने उन्हें सामूहिक तौर पर उन्हें 'संजय के छोकरे' में एक माना था.
कांग्रेस पर नज़र रखने वाले पत्रकार पंकज वोहरा बताते हैं कि कमलनाथ, संजय गांधी और अकबर अहमद डंपी तीनों दून स्कूल में साथ में पढ़ते थे और उनकी गहरी मित्रता थी. इंदिरा गांधी के समय कमलनाथ कांग्रेस में शामिल हुए.
वोहरा के मुताबिक, "1977 में जब संजय गांधी पहली बार अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो अकबर अहमद डंपी और कमलनाथ दोनों उनके साथ ही रहते थे. कमलनाथ चुनाव प्रबंधन में मदद करते थे. वह लखनऊ के एक होटल में ठहरे हुए थे और वहां से हर रोज़ अमेठी आते-जाते थे. वह चुनाव प्रचार के समय संजय गांधी के साथ ही रहते थे."
संजय से मित्रता से पहले कमलनाथ की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि कमलनाथ राजनीतिक तिकड़मों में माहिर थे और मुश्किल काम करवाना जानते थे. इसीलिए कांग्रेस में उन्हें औपचारिक पद भले ही जल्दी न मिला हो लेकिन वह संजय गांधी की मंडली में शामिल हो गए थे.
कमलनाथ में ख़ास क्या था
संजय के व्यवहार-कौशल का उदाहरण देते हुए किदवई एक क़िस्सा सुनाते हैं.
किदवई बताते हैं, "जब 1978 में जनता पार्टी का शासन चल रहा था तब कमलनाथ को ख़बर मिली कि चौधरी चरण सिंह, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से ख़ुश नहीं हैं. उन्होंने राजनारायण से संपर्क साधा और उनसे कहा कि अगर चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो जाते हैं तो कांग्रेस समर्थन देकर उन्हें प्रधानमंत्री बना देगी. बाद में यही हुआ. हालांकि वह सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाई."
"कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और दोबारा इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. उस दौर में राजनीतिक तिकड़मों में कमलनाथ का अहम योगदान था. इंदिरा गांधी राजनारायण से मिलकर ये काम नहीं कर सकती थीं. कमलनाथ ने अपने सूत्रों के आधार पर ये काम किया था."
वह बताते हैं कि 1977 के बाद जो नई कांग्रेस बनी थी, जिसे कांग्रेस आई कहा गया, उसे बनाने में भी कमलनाथ का अहम योगदान था.
वहीं पंकज वोहरा मानते हैं कि कमलनाथ की असल ताक़त ये है कि वे सुनियोजित तरीक़े से काम करने वाले नेता हैं. उनके मुताबिक, "जितने योजनाबद्ध तरीक़े से कमलनाथ काम करते हैं, जिस तरह वह बारीक़ ब्यौरों में जाते है, वह आज कल दुर्लभ है. उनकी ये बात इंदिरा और संजय को पसंद आई."
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