Wednesday, February 6, 2019

कश्मीर में सेना का साथ देने वाले लड़ाकों का क्या हुआ

ये 20 दिसंबर 1994 की बात है, जब कश्मीर की सर्दियों में गुलाम नबी लोन उर्फ़ शफात ने भारतीय सेना और भारत प्रशासित कश्मीर में अनंतनाग ज़िले के पुलिस अ​धिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया था.

कभी चरमपंथी रहे गुलाम नबी लोन आत्मसमर्पण के साथ ही इख्वानी का काम करने लगे थे. इख्वान यानी सेना की तरफ से लड़ाई का मोर्चा संभालने वाले.

1989 में 14 साल की उम्र में लोन हथियारों की ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान पहुंच गए थे. कश्मीर वापसी हुई दो साल बाद.

कुछ समय के लिए लोन ने चरमपंथी गतिविधियों में हिस्सा लिया और 1994 की शुरुआत में वो ये सारे काम छोड़कर घर बैठ गए.

साल 2003 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इख्वानी पर रोक लगा दी. इसके बाद से लोन ज़िंदगी बसर और समाज में स्वीकार किए जाने को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.

इख्वान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चरमपंथी लड़ाकों को मुख्य धारा में लाया जाता है. चरमपंथी संगठनों के लिए काम कर रहे ये लड़ाके आत्मसमर्पण के बाद भारतीय सेना के साथ काम करने लगते हैं. इस प्रक्रिया पर रोक लगने से पहले कई लड़ाके चरमपंथ छोड़ इख्वानी बने थे.

मैं अनंतनाग के गुड़ी स्थित लोन के एक मंजिला घर में गया. जब मैंने उनसे एक चरमपंथी और इख्वानी के तौर पर उनकी पिछली ज़िंदगी के बारे में पूछा तो उन्होंने तुरंत ही मेरे सामने उन्हें इख्वानी साबित करने वाले कई दस्तावेज रख दिए.

लोन कहते हैं, ''मैंने और कुछ सहयोगियों ने 1996 विधानसभा चुनावों के शांतिपूर्ण संचालन के लिए काम किया था और इसके बदले सरकार ने हमें छोड़ दिया. मैंने जम्मू-कश्मीर पुलिस में एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) के तौर पर काम किया था. तब एक एसपीओ होने के नाते मुझे कुछ समय के लिए दो हजार रुपए महीना वेतन भी मिला, जो मेरे परिवार को चलाने के लिए काफ़ी नहीं था.''

वो कहते हैं, ''इस दौरान 2004 में भारतीय सेना ने टेरिटोरियल आर्मी की यूनिट बनाई और मुझे उसमें नौकरी दी. लेकिन मैं पारिवारिक हालात और ख़राब सेहत के चलते काम नहीं कर पाया. जब से मैं घर वापस आया, तब से बस अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगा हूं और ज़िंदगी के बेहतर होने का इंतजार कर रहा हूं. लेकिन, हमारे जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया गया. हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं.''

1989 में हज़ारों कश्मीरी युवा हथियारों के प्रशिक्षण के लिए सीमा पार करके पाकिस्तान चले गए थे और कश्मीर में भारतीय प्रशासन के ख़िलाफ़ व्रिदोह कर दिया था.

लोन एक बार चरमपंथ का रास्ता अपनाने के बाद अपने इख्वान बनने का कारण बताते हैं.

वो कहते हैं, ''जब मैं प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान गया था तो मुझे बिल्कुल भी इल्म नहीं था कि क्या करना है और मैंने सीमा क्यों पार की है. मुझे नहीं पता था कि पाकिस्तान जाने और हथियार उठाने के पीछे क्या मकसद था. 1991 तक पाकिस्तान में दो साल बिताने के बाद मैं भारत के ख़िलाफ़ लड़ने वाला एक चरमपंथी था. लेकिन जब 1994 में मैंने किसी भी चरमपंथी गतिविधि में हिस्सा ना लेने का फैसला किया तो कुछ चरमपंथी मेरे घर पर आए और मुझे जान से मारने की धमकी दी.''

''फायरिंग की घटना के बाद मैंने अन्य चरमपंथियों के साथ 20 दिसंबर 1994 को पुलिस और सेना के शीर्ष अधिकारियों के सामने खानाबल सेना मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया था. इसके बाद हम सरकारी बंदूकधारी बन गए. भारत सरकार ने हमें शरण दी और ट्रेनिंग दी. 1994 से 2003 तक लगातार हमने भारत के लिए काम किया.''

इख्वानी का अतीत लोन को अब भी डराता है जबकि वो अब एक सामान्य ज़िंदगी जी रहे हैं.

लोन कहते हैं कि अपने अतीत को वो भारी कीमत अदा कर रहे हैं.

लोन बताते हैं, ''हमारे पड़ोसी भी हमें भारतीय एजेंट, सरकारी बंदूकधारी कहकर बुलाते हैं और हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं. इख्वान के ठप्पे के साथ जीना आसान नहीं है. जब हम कहीं और काम करने जाते हैं तो लोग हमें नौकरी नहीं देते. वो कहते हैं कि हम इख्वान हैं. वो सोचते हैं कि अगर वो हम लोगों को काम पर रख लेंगे तो चरमपंथी उन्हें मार देंगे. हमारे घरों में ये डर हमेशा बना रहता है.

हमने चरमपंथियों को छोड़कर हर किसी से हमें माफ करने की विनती की. उनसे कहा कि अब वो समय जा चुका है. हम भी इंसान हैं. लेकिन, लोग नहीं सुनते हैं. जब पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ब्रिगेडियर थे तो मैंने उनके साथ चार साल काम किया था. मैंने उनसे कई बार पुनर्वास के लिए अुनरोध किया लेकिन सब बेकार चला गया.''

लोन की एक पत्नी और तीन बच्चे हैं. उनका गावं गुड़ी, इख्वानी गति​विधियों का गढ़ है और यहां एक इख्वान शिविर भी है.

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